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भक्तिकालीन साहित्य : विविध धाराओं का वैशिष्ट्य और युगीन प्रासंगिकता पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

कला मनीषी नर्मदा प्रसाद उपाध्याय, पूर्व कुलपति प्रो. बालकृष्ण शर्मा एवं डॉ. नन्दवाना का हुआ सारस्वत सम्मान

उज्जैन। सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला द्वारा मंगलवार को भक्तिकालीन साहित्य : विविध धाराओं का वैशिष्ट्य और युगीन प्रासंगिकता विषय पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। एमपी कॉन, भोपाल के सहयोग से आयोजित संगोष्ठी के मुख्य अतिथि प्रख्यात कला मनीषी नर्मदाप्रसाद उपाध्याय, इंदौर थे।

मुख्य वक्ता राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी थे। अध्यक्षता संस्कृतविद् पूर्व कुलपति प्रो. बालकृष्ण शर्मा ने की।

कार्यक्रम के सारस्वत अतिथि पद्मश्री डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित, डॉ. नवीन नन्दवाना, उदयपुर, पुरातत्वविद पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास, भोपाल, डॉ. श्रीकृष्ण काकड़े, अकोला, महाराष्ट्र, कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा, मुद्राशास्त्री डॉ. रामचंद्र ठाकुर, डॉ. शिव चौरसिया, प्रो. जगदीश चंद्र शर्मा आदि ने संगोष्ठी में विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम में कला मनीषी नर्मदा प्रसाद उपाध्याय, पूर्व कुलपति प्रो. बालकृष्ण शर्मा, डॉ. नवीन नन्दवाना, उदयपुर को शॉल, श्रीफल, साहित्य अर्पित कर उनका सारस्वत सम्मान किया गया।

पूर्व कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपने उद्बोधन में कहा कि भक्ति तत्व कर्म और ज्ञान के साथ समन्वित हुआ। वैदिक साहित्य में सृष्टि के दिव्य तत्वों के प्रति स्तुति दिखाई देती है। सारी सृष्टि आनंदमयी है, सौन्दर्यमयी है, उसे दिखाते हैं वैदिक ऋषि और भक्त कवि। बाद में गुणकीर्तन के साथ भक्ति तत्व आगे बढ़ा।

कला मनीषी नर्मदा प्रसाद उपाध्याय, इंदौर ने अपने वक्तव्य में भक्ति और भक्ति आंदोलन की दृश्य परम्परा का सारगर्भित रूप प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भक्ति आंदोलन के आधार पर असंख्य भारतीय कलाकारों ने अपनी कला को समृद्ध किया है। शोधार्थियों को सिंधिया प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में भक्ति काव्य के प्राचीन ग्रंथों का अवलोकन करना चाहिए।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. बालकृष्ण शर्मा ने भक्ति के स्वरूप और लक्षणग्रंथों पर बात करते हुए बताया कि आत्म स्वरूप का अनुसंधान करना ही भक्ति है। जो व्यक्ति अभिलाषा से शून्य है वही परमभक्त हो सकता है।

कुलानुशासक एवं हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि आज विश्व को सहिष्णुता, प्रेम और करुणा जैसे गुणों की आवश्यकता है। यह भक्ति काव्य सिखाता है। भक्ति काव्य मध्यकालीन साहित्य का अद्वितीय सोपान है।

कबीर, गुरुनानक, तुलसी, मीरा जैसे भक्ति आंदोलन के कवियों ने जो संदेश दिए, वे वर्तमान युग की कई समस्याओं का समाधान देते हैं। भक्ति पलायन या कायरता नहीं है, यह शौर्य का कार्य है। भक्ति जीवन जीने की शाश्वत कला है। भागदौड़ और तनावपूर्ण समय में इसकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है।

पद्मश्री डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित ने अपने वक्तव्य में भक्ति साहित्य के विभिन्न स्वरूपों पर चर्चा की। अकोला महाराष्ट्र से आए डॉ. श्रीकृष्ण काकड़े ने अपने उद्बोधन में मराठा साम्राज्य में भक्ति साहित्य के विकास पर चर्चा की।

डॉ. नवीन नंदवाना ने अपने उद्बोधन में कहा कि सन्त कवि दादूदयाल और उनकी परम्परा के संत कवियों ने सामाजिक समरसता और परस्पर प्रेम का सन्देश दिया जो आज भी प्रासंगिक है। मीरा जैसी भक्तिमति कोई दूसरी कवयित्री नहीं हुईं जिन्होंने नारी चेतना के नए प्रतिमान रचे।

मुद्राशास्त्री डॉ. रामचंद्र ठाकुर ने अपने वक्तव्य में मुद्राओं पर भक्ति के स्वरूप को बताते हुए बताया कि 2600 वर्षों पहले के सिक्कों पर शिव पार्वती, राम, कृष्ण आदि का चित्रण और उल्लेख मिलते हैं।

तकनीकी सत्र में डॉ. शिव चौरसिया ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में हिंदी भक्ति साहित्य के व्यापक स्वरूप पर प्रकाश डाला और शोधार्थियों को सूक्ष्मता के साथ शोध कार्य करने की लिए प्रेरित किया।

लोक गायक स्नेहा गेहलोत एवं शरद गेहलोत ने मीरा एवं निर्गुणी भजनों की प्रस्तुति दी। सुंदरलाल मालवीय एवं माया बधेका ने पारम्परिक गीत प्रस्तुत किए। विभिन्न भक्त कवियों के साहित्य पर अनेक शोधकर्ताओं ने शोधपत्र प्रस्तुत किए।

इनमें डॉ. नेत्रा रावणकर, प्रीति शर्मा, नई दिल्ली, सीमा देवेंद्र जोशी, संदीप कुमार कपूर, सीमा पंड्या, प्राध्यापिका संगीता मिर्धा, डॉक्टर रेखा भालेराव, माया मालवीय, शिवांगी शर्मा भोपाल आदि सम्मिलित थे।

विश्वविद्यालय के वाग्देवी भवन स्थित राष्ट्रभाषा सभागार में सम्पन्न संगोष्ठी वरिष्ठ साहित्यकार श्रीराम दवे, प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक मुकेश जोशी, राजेश सक्सेना, डॉ. चिंतामणि राठौड़, नरेन्द्र सिंह कुशवाह, काजल नन्दी आदि सहित अनेक प्रबुद्धजनों, साहित्यकारों और विद्यार्थियों ने ज्ञान सत्रों में भाग लिया।

कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार स्व. देवेंद्र जोशी पर केंद्रित पत्रिका के विशेषांक का लोकार्पण अतिथियों द्वारा किया गया। नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने लघुचित्रों के कैटलॉग की प्रति प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा को अर्पित की।

कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी पूजा परमार और डॉ. प्रतिष्ठा शर्मा ने किया और आभार प्रदर्शन निधि त्रिपाठी और श्रीराम सौराष्ट्रीय ने किया।IMG 20260224 WA0035

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