वाराणसी। अजा एकादशी का व्रत प्रति वर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह तिथि 18 अगस्त सोमवार को सायं 05:23 बजे प्रारंभ होकर 19 अगस्त मंगलवार को दोपहर 03:33 बजे तक रहेगी। चूंकि 19 अगस्त को सूर्योदय व्यापिनी एकादशी तिथि है, अतः व्रत का निर्वाह इसी दिन, मंगलवार 19 अगस्त 2025 को किया जाएगा।
पारण का समय : अजा एकादशी व्रत का पारण 20 अगस्त बुधवार को द्वादशी तिथि में प्रातः 06:34 बजे से 08:24 बजे तक किया जा सकता है। पंडित श्री मनोज कृष्ण शास्त्री जी ने जानकारी देते हुए बताया कि वर्ष भर में कुल 24 एकादशियाँ होती हैं, परंतु अधिकमास (मलमास) आने पर यह संख्या 26 हो जाती है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को ‘अजा एकादशी’ कहा जाता है।
यह व्रत अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इसके प्रभाव से मोक्ष की प्राप्ति, दीर्घायु, तथा अश्वमेध यज्ञ के तुल्य फल प्राप्त होते हैं। साथ ही यह व्रत समस्त पापों से मुक्ति दिलाने वाला होता है। स्त्री-पुरुष दोनों ही इस व्रत को श्रद्धापूर्वक कर सकते हैं।
व्रत पारण के बाद किसी जरूरतमंद अथवा योग्य ब्राह्मण को भोजन कराकर, यथाशक्ति दक्षिणा एवं मिष्ठान आदि दान अवश्य देना चाहिए। इस दिन किया गया दान समस्त पापों का नाश करता है और परमपद की प्राप्ति कराता है।
एकादशी व्रत का धार्मिक, मानसिक एवं स्वास्थ्य लाभ : एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना हेतु होता है। इस दिन “ॐ नमो वासुदेवाय” मंत्र का जाप विशेष फलदायी होता है। यह व्रत न केवल धार्मिक रूप से महत्व रखता है, बल्कि यह मन और शरीर दोनों को शुद्ध करने वाला व संयम की प्रेरणा देने वाला भी है।
अजा एकादशी व्रत की पूजन विधि :
दशमी तिथि को ही सात्त्विक भोजन कर लें, और एकादशी के दिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें।
स्नान के उपरांत सूर्यदेव को अर्घ्य देकर व्रत का संकल्प लें।
घर के शुद्ध स्थान पर चौकी बिछाकर श्रीगणेश तथा लक्ष्मी-नारायण जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
गंगाजल या गोमूत्र से चौकी और पूजन स्थल का शुद्धिकरण करें।
चांदी, तांबे या मिट्टी के कलश में जल भरकर उस पर नारियल स्थापित करें और कलश पूजन करें।
नवग्रह, तीर्थ, योगिनी, नगर देवता आदि का आवाहन करें।
इसके पश्चात वेदमंत्रों एवं विष्णु सहस्रनाम द्वारा षोडशोपचार पूजन करें, जिसमें शामिल हो : आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, आभूषण, चंदन, रोली, हल्दी, पुष्प, सुगंध, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, पान, तिल, दक्षिणा, आरती, मंत्र पुष्पांजलि आदि। व्रत कथा सुनें या पढ़ें। अंत में प्रसाद वितरण कर पूजन संपन्न करें।
एकादशी व्रत में इन बातों का अवश्य ध्यान रखें :
तामसिक भोजन (मांस, लहसुन, प्याज आदि) से परहेज करें।
पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।
शराब व नशीले पदार्थों से दूर रहें।
दाढ़ी, बाल, नाखून न काटें।
पूजा करते समय चमड़े की वस्तुएँ, बेल्ट, चप्पल-जूते न पहनें।
काले वस्त्रों का त्याग करें।
मन, वचन और कर्म से किसी को ठेस न पहुंचाएं, यही सच्चा धर्म है।
ज्योतिर्विद रत्न वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 99938 74848
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