कोलकाता | 20 जनवरी 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर तीसरे विकल्प की बहस तेज़ होती दिख रही है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने दावा किया है कि राज्य में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों के प्रति जनता का असंतोष लगातार बढ़ रहा है, और लोग अब वाम मोर्चे के रूप में एक वैकल्पिक राजनीतिक विकल्प की तलाश कर रहे हैं।
माकपा केंद्रीय समिति के सदस्य सुजान चक्रवर्ती ने कहा कि तृणमूल और भाजपा द्वारा चुनावी मुकाबले को द्विध्रुवीय बनाने की कोशिशें सफल नहीं होंगी। उनके मुताबिक, “बंगाल के लोग दोनों पार्टियों से तंग आ चुके हैं और वाम मोर्चे को तीसरे विकल्प के तौर पर देख रहे हैं।”
🚩 ‘बांग्ला बचाओ यात्रा’ से बदला माहौल : माकपा
सुजान चक्रवर्ती ने दावा किया कि नवंबर-दिसंबर 2025 में आयोजित 1000 किलोमीटर लंबी ‘बांग्ला बचाओ यात्रा’ को राज्यभर में अच्छा जनसमर्थन मिला। 20 दिनों तक चली इस यात्रा के दौरान बंगाल के विभिन्न इलाकों में पार्टी को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली, जिससे वाम मोर्चे का मनोबल बढ़ा है।

उन्होंने कहा, “आगामी विधानसभा चुनावों में ‘बांग्ला बचाओ यात्रा’ का असर ज़रूर दिखेगा। लोग तृणमूल और भाजपा की राजनीति से परेशान हैं।”
यात्रा के बाद माकपा अब जिलास्तर पर स्थानीय रैलियां और जनसभाएं आयोजित कर रही है।
⚠️ ‘बंगाल की सामाजिक एकता खतरे में ’
जादवपुर से माकपा के पूर्व सांसद चक्रवर्ती ने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने ही बंगाल में भाजपा को मजबूत होने का मौका दिया।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि विकास, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों की जगह धार्मिक ध्रुवीकरण हावी होता है, तो राज्य का धर्मनिरपेक्ष सामाजिक ताना-बाना खतरे में पड़ जाएगा।
📢 ‘अन्याय और लोकतांत्रिक क्षरण के खिलाफ आंदोलन’
माकपा के अनुसार, ‘बांग्ला बचाओ यात्रा’ का उद्देश्य तृणमूल सरकार के शासन में हुए अन्याय, लूट, लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण को उजागर करना, और साथ ही भाजपा-नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करना है।
🗣️ तृणमूल का पलटवार
वहीं, तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष ने माकपा के दावों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “माकपा की बंगाल की राजनीति में कोई प्रासंगिकता नहीं बची है। उन्हें ‘माकपा बचाओ यात्रा’ निकालनी चाहिए।”
📉 2011 के बाद से हाशिये पर वाम मोर्चा
गौरतलब है कि 1977 से 2011 तक बंगाल पर शासन करने वाले वामपंथी दल पिछले एक दशक से राजनीतिक रूप से कमजोर पड़े हैं। माकपा 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों तथा 2021 के विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाई, जिसके चलते उसने प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा भी गंवा दिया, जो अब भाजपा के पास है।
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