कोलकाता न्यूज डेस्क | 2 मार्च 2026: पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय के वोटर लिस्ट से नाम हटने से हड़कंप मच गया है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत लाखों नाम हटाए गए हैं, जिससे नागरिकता और पहचान को लेकर गहरी चिंताएं बढ़ गई हैं।
मतुआ समुदाय के वोटरों के नाम कटने से बीजेपी और टीएमसी दोनों के लिए यह चुनावी चुनौती बन गया है, क्योंकि मतुआ वोट बैंक राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है।
एसआईआर में क्या हुआ?
चुनाव आयोग ने 2002 के बाद पहली बार वोटर लिस्ट की गहन जांच की। जिन लोगों का नाम 2002 की वोटर लिस्ट में नहीं था, उनसे पहचान और नागरिकता के दस्तावेज मांगे गए। जिनके पास सही कागज़ नहीं थे, उनके नाम लिस्ट से हटा दिए गए।

- नवंबर से अब तक करीब 63 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए हैं।
- लगभग 60 लाख नाम अभी जांच के अधीन हैं।
- मतुआ-बहुल सीटों पर 25,000 से 40,000 तक नाम कटे हैं।
- हर विधानसभा क्षेत्र से इस समुदाय के लोगों के नाम कटे हैं।
50 सीटों पर सीधा असर मतुआ समुदाय पश्चिम बंगाल की 50 विधानसभा सीटों पर असर रखता है। यह सीटें चुनाव परिणाम बनाने और बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।
- 2019 के बाद से यह समुदाय बड़ी संख्या में BJP के साथ जुड़ा था।
- अब नाम कटने के बाद बीजेपी बचाव में उतर आई है।
- टीएमसी आरोप-प्रत्यारोप लगा रही है।
TMC का रुख – SIR का विरोध
सीएम ममता बनर्जी शुरुआत से ही एसआईआर का विरोध करती आ रही हैं। TMC का कहना है कि 2002 के बाद आए लोगों के पास दस्तावेज नहीं हैं, इसलिए उनके नाम हट रहे हैं और वे वोट देने का अधिकार खो सकते हैं।
बीजेपी का बचाव – CAA से राहत
केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर ने भरोसा दिलाया है कि अगर किसी शरणार्थी का नाम हटता है, तो उसे CAA के तहत नागरिकता मिल सकती है। बीजेपी अपने वोटरों के नाम बचाने की कोशिश में लगी है।
चुनावी माहौल में सियासी पारा हाई
विधानसभा चुनाव से पहले बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम कटने से सियासी सरगर्मी बढ़ गई है। दोनों पार्टियां एक-दूसरे पर आरोप लगा रही हैं। देखना होगा कि आने वाले दिनों में क्या होता है।
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