विनय कुमार | विशेष रिपोर्ट : बंगाल की लोक‑संस्कृति में भूत सिर्फ डराने वाली परछाई नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा हैं।डायन, शंखचुन्नी, निशी डाक और ब्रह्मदैत्य जैसे लोक‑भूतों की कहानियाँ- ग्रामीण जीवन, स्त्रियों की स्थिति, पुरुष प्रधान समाज और सत्ता संरचनाओं से गहराई से जुड़ी हैं।
यहीं से यह सवाल उठता है— क्या बंगाल के ‘भूत’ सचमुच अलौकिक हैं, या वे सामाजिक दबाव की भाषा हैं?
इस रिपोर्ट में हम बंगाल की भूत-परंपरा को सामाजिक, सांस्कृतिक अध्ययन और जेंडर लेंस से पढ़ेंगे।

भूत-परंपरा की जड़ें:
बंगाली लोककथाएँ (फोकटेल्स) सदियों पुरानी हैं, जो संस्कृत के ‘भूता’ से निकली है। जिनकी जड़े बंगाली साहित्यकार दक्षिणरंजन मित्र मजुमदार की ठाकुरमार झुली (1907) और रेव. लाल बिहारी दे की फोक-टेल्स ऑफ बंगाल (1883) संग्रहों में आज भी सांस ले रही हैं।
ये कथाएँ बताती हैं कि भूत डर से ज्यादा, समाज की छुपी सच्चाइयाँ हैं, जो लोककथाओं में आज भी जिंदा है।
इस संघर्ष को समझने के लिए सबसे पहले हमें भूत परंपरा की जड़ों के बारे में जानना जरूरी है –
शंखचुन्नी (शंखचुर्णी): एक विवाहित महिला की आत्मा, जो पति की क्रूरता से मरकर लौटती है—कलाई में शंख और लंबे कान वाली, खुशहाल महिलाओं पर हमला करती है। गर्भकालीन अवस्था में मरने वाली स्त्री की आत्मा को पेतनी कहा गया।
डायन (डायनी): यह जीवित महिला है, जो काला जादू करती है—आमतौर पर बूढ़ी, विधवा या अकेली महिलाओं पर यह आरोप लगता है।
निशी डाक: ज़्यादातर कहानियों और लोककथाओं में निशी डाक एक ऐसी आत्मा होती है, जो रात में किसी परिचित व्यक्ति की आवाज़ में पुकारती है और अपने शिकार को फंसाती है।
ब्रह्मदैत्य (ब्राह्मण भूत): उच्च वर्ण का भूत, जो पीपल के पेड़ पर रहता है। स्वभाव से वह कभी दयालु तो कभी क्रूर होता है। इनके अलावा श्रमिकों की आत्मा को ‘गेछो भूत’, जंगल में मरने वाले को ‘बेगो भूत’ और मछली चुराकर खाने वाली को ‘मेछो भूत’ कहा जाता हैं।
ये कथाएँ 19वीं सदी के औपनिवेशिक काल से आधुनिकता तक विकसित हुईं, जहाँ भूत सामाजिक समस्याओं (जाति, वर्ग, जेंडर) का प्रतीक बनते हैं।

नाम ना छापने की शर्त पर कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एवं लोक-साहित्य विशेषज्ञ बताते हैं:-“बंगाल की भूत-कथाएँ डर पैदा करने से अधिक सामाजिक आचरण को नियंत्रित करने का औज़ार हैं।”
👩🦱 स्त्रियों से जुड़े भूत क्यों?
- बंगाल की लोककथाओं में स्त्रियों को अक्सर डायन, शंखचुन्नी, चुड़ैल या पेतनी और निशी डाक के रूप में चित्रित किया गया है।
- यह छवि स्त्रियों की स्वतंत्रता, यौनिकता और सामाजिक भूमिका को नियंत्रित करने का माध्यम रही है।
- जो महिलाएँ सामाजिक मानदंडों से अलग होतीं—जैसे विधवा, संतानहीन, या आर्थिक रूप से स्वतंत्र—उन्हें अक्सर “डायन” कहा जाता।
- Cultural Studies के दृष्टिकोण से यह पितृसत्तात्मक समाज का डर है, जो स्त्रियों को भूत बनाकर उनकी आवाज़ दबाता है।

वे कहते हैं— “जिस स्त्री को समाज नहीं समझ पाता, उसे भूत बना देता है। जबकि ब्रह्मदैत्य जैसे पुरुष भूत श्रेष्ठ होते हैं। यह सत्ता संरचना का प्रतीक है – जहां मृत्यु के बाद भी ब्राह्मण की श्रेष्ठता बनी रहती है, जबकि महिला भूत नीच या खतरनाक दिखाए जाते हैं।”
जेंडर लेंस से देखा जाए तो ये कथाएँ महिलाओं की दबी आवाज़ हैं, जो डर के माध्यम से सामाजिक असमानता को उजागर करती हैं।
कोलकाता के जादवपुर में रहने वाली सामाजिक कार्यकर्ता नर्मदा चक्रवर्ती विगत 12 वर्षों से पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में डायन प्रथा को लेकर लोगों में जागरुकता फैला रही है। वह कहती हैं:- “डायन कोई अलौकिक स्त्री नहीं, बल्कि वह स्त्री है, जिसे समाज नियंत्रित नहीं कर पा रहा।”
2018 में आई हॉरर कॉमेडी फिल्म “स्त्री” भी इसी तरह की घटनाओं से प्रेरित थी।
फिल्म में “स्त्री” उन असंख्य महिलाओं के दमित क्रोध और बदले की भावना का प्रतीक है, जिन्हें पितृसत्तात्मक समाज ने सदियों से केवल यौन वस्तु मानकर उनकी आत्मा, सम्मान और सच्चे प्यार से वंचित रखा है।
फिल्म का संदेश साफ है– महिलाओं को सम्मान, प्यार और बराबरी दो तब वो शक्ति बनकर समाज की रक्षा करेंगी; अन्यथा उनका दमित क्रोध विनाशकारी हो सकता है।
ग्रामीण बंगाल में ‘डायन’ की राजनीति: सत्ता का खेल
“ग्रामीण बंगाल में डायन-शिकार की पुरानी समस्या 1980 के दशक में सबसे ज्यादा चर्चित थी। यहां के बीरभूम, बांकुड़ा, मेदिनीपुर और पुरुलिया जैसे जिलों में डायन-शिकार कोई बीती हुई परंपरा नहीं, बल्कि एक जीवित सामाजिक हिंसा है।
बांकुड़ा की रहने वाली 55 वर्षीया सुमित्रा हलदर बताती हैं -“मेरी पड़ोसन को डायन कहकर मार दिया गया, सिर्फ इसलिए कि वो विधवा थी और उसके पास कुछ जमीने थी। भूत कथाएँ हमें डराने के लिए हैं, लेकिन असली भूत तो समाज के पुरुष हैं।”
यह पैटर्न आज भी कई जिलों में दिखता है, जहाँ विधवाओं की संपत्ति हड़पने के लिए अफवाहें फैलाई जाती हैं और उन्हें डायन बनाकर प्रताड़ित किया जाता है। यह न केवल अंधविश्वास का मामला है, बल्कि पितृसत्ता और आर्थिक लालच का घिनौना खेल है, जो महिलाओं को सबसे कमजोर बनाता है।”
बीरभूम के ओझा रामेन मंडल कहते हैं – “शंखचुन्नी विवाह की पवित्रता सिखाती है लेकिन आज ये कथाएँ महिलाओं को दबाने के लिए इस्तेमाल होती हैं। मैंने ऐसे कई मामले देखे हैं, मगर मानसिक बीमारी को भूत कहकर इलाज नहीं किया।”
अध्ययनों और जमीनी रिपोर्टों से स्पष्ट होता है कि इन घटनाओं का संबंध अंधविश्वास से कम और सत्ता से अधिक है। अधिकांश मामलों में निशाना बनने वाली महिलाएँ बुज़ुर्ग, विधवा, निःसंतान या अकेली होती हैं—जिनके पास ज़मीन, घर या पारिवारिक संपत्ति होती है।
राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (NLSIU) के 2019 के अध्ययन के अनुसार,
“डायन-आरोप अक्सर संपत्ति विवाद, जातिगत तनाव और पुरुष-प्रधान सामाजिक नियंत्रण का औज़ार बन जाते हैं, जहाँ बीमारी, मृत्यु या दुर्भाग्य का दोष एक महिला पर डाल दिया जाता है।”
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने भी अपनी कई फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्टों में यह दर्ज किया है कि डायन कहकर प्रताड़ित की जाने वाली महिलाओं को सामाजिक बहिष्कार, हिंसा और कई मामलों में हत्या तक का सामना करना पड़ता है—और पुलिस कार्रवाई अक्सर देर से होती है।
बांकुड़ा ज़िले के सामाजिक कार्यकर्ता बुबुन कहते हैं:- “डायन कहना सबसे आसान तरीका है किसी औरत को चुप कराने का।”
मानवशास्त्री और लोक-संस्कृति पर काम करने वाले विद्वानों के अनुसार, डायन की अवधारणा यहाँ केवल लोक-कथा नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन का हथियार बन चुकी है—जहाँ समुदाय की असुविधाजनक महिलाओं को “अलौकिक ख़तरे” के रूप में चिह्नित कर दिया जाता है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और महिला अधिकार संगठनों के अनुसार, देश के पूर्वी और मध्य भारत के कई हिस्सों में हर साल डायन-हत्या और उत्पीड़न के दर्जनों मामले सामने आते हैं, जिनमें पश्चिम बंगाल भी शामिल है।
ग्रामीण महिला अध्ययन, सामाजिक न्याय रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण बंगाल में डायन कहे जाने के मामले सिर्फ़ अंधविश्वास नहीं हैं, वे सत्ता संघर्ष के उदाहरण हैं। अक्सर ज़मीन विवाद, विधवापन, जातीय/आर्थिक अलगाव, को “डायन” के आरोप में बदल दिया जाता है। कई मामलों में सामाजिक बहिष्कार, शारीरिक हिंसा और कभी-कभी हत्या तक होती है।
साहित्य में भूतों की सामाजिक व्याख्या
लोककथाएँ सामाजिक नियंत्रण का माध्यम हैं। शंखचुन्नी महिलाओं को अनुशासन भंग करने पर सजा के रूप में ‘सही’ विवाह का डर दिखाती है जबकि ब्रह्मदैत्य जाति व्यवस्था मजबूत करता—नीचे वर्ग वाले उनसे डरते है। ये कथाएँ वर्ग संघर्ष, जेंडर असमानता को छिपाती हैं, लेकिन उजागर भी करतीं है।
आधुनिक बंगाली साहित्य (बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय) में भूत सामाजिक आलोचना हैं लेकिन ग्रामीण इलाकों में ये नियंत्रण का हथियार—महिलाओं को ‘डायन’ कहकर अलग-थलग करना।
“उनकी रचनाओं में ‘भूत’ अक्सर किसी दबी हुई भावना, अपूर्ण इच्छा, या अतीत के बोझ का प्रतीक हो सकते हैं, जो आधुनिकता के दबाव या सामाजिक बदलावों के कारण पैदा होते हैं, न कि केवल डरावनी कहानियों के लिए।”
जबकि शीर्षेंदु मुखोपाध्याय की कहानियों में भूत सिर्फ डरने वाली चीज़ नहीं, बल्कि ऐसे पात्र हैं जो समाज, वर्ग और मानवीय रिश्तों पर हास्य और कल्पना के साथ प्रकाश डालते हैं, जिससे वे बंगाली साहित्य में एक खास जगह रखते हैं।
सुप्रसिद्ध मानवशास्त्री Mary Douglas (Purity and Danger) के अनुसार, समाज “ख़तरे” की कहानियाँ बनाता है ताकि वह सीमाएँ तय कर सके। बंगाल में भूत रात में बाहर जाने से रोकते हैं, स्त्री की यौन स्वतंत्रता पर निगरानी रखते हैं, ‘अलग’ होने की सज़ा देते हैं। यह Cultural Policing है, जो कानून से नहीं, कथा से चलता है।
आधुनिक विज्ञान की सीमाएँ
विज्ञान भूतों को नींद पक्षाघात (स्लीप पैरालिसिस) या भ्रम बताता है—बोबा जिन नींद में दबाव महसूस कराता है लेकिन इसकी अपनी सीमाएँ हैं। सांस्कृतिक संदर्भ में ये मानसिक स्वास्थ्य के लक्षण हैं— ट्रॉमा, तनाव से उपजे हुए।
- Indian Journal of Psychiatry (2017) में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, ग्रामीण भारत में कई तथाकथित “भूत-प्रभाव” मामलों में अवसाद, PTSD, Dissociative Disorders के लक्षण पाए गए।
- डॉ. समीर भट्टाचार्य, मनोचिकित्सक (बर्धमान मेडिकल कॉलेज): “जहाँ भाषा नहीं, वहाँ भूत शब्द बन जाता है।
- डॉ. प्रिया चटर्जी, जेंडर स्टडीज विशेषज्ञ, जादवपुर विश्वविद्यालय: “बंगाली भूत जेंडर असमानता के प्रतीक हैं—महिला भूत पीड़ित हैं, पुरुष शक्तिशाली। डायन-शिकार राजनीति है, संपत्ति हड़पने की। विज्ञान मदद करता है, लेकिन सांस्कृतिक बदलाव जरूरी।”
- पैरानॉर्मल एक्टिविस्ट : “रात में गाँवों में ‘भूत’ आवाजें सुनाई देती हैं—लेकिन ये ट्रॉमा से उपजे हैं। शंखचुन्नी जैसी कथाएँ महिलाओं के दर्द को आवाज़ देती हैं, लेकिन समाज उन्हें चुप कराता है।”
विज्ञान अंधविश्वास कम करता है, लेकिन सामाजिक पूर्वाग्रह (जैसे डायन-शिकार) को नहीं रोक पाता—यहाँ कानून और शिक्षा की जरूरत है।
निष्कर्ष: भूत से मुक्ति का सफर
बंगाल के भूत अंधविश्वास नहीं बल्कि सामाजिक संरचना की परछाईं हैं। जब तक जेंडर असमानता, संपत्ति पर संघर्ष और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा होती रहेगी, तब तक भूत भी जिंदा रहेंगे।
इन कथाओं को मानसिक स्वास्थ्य, जेंडर और सामाजिक दबाव के संदर्भ में पढ़ना हमें यह समझने में मदद करता है कि लोक‑विश्वास कैसे सामाजिक नियंत्रण और सत्ता का हथियार बन जाते हैं।
बंगाल का भूत डर से ज्यादा, समाज की सच्चाई है—जेंडर दबाव, सत्ता खेल, और मानसिक संकट। लोककथाएँ नियंत्रण का औजार हैं, लेकिन बदलाव का माध्यम भी। विज्ञान और शिक्षा से ये ‘भूत’ कम होंगे, लेकिन सांस्कृतिक संवाद जरूरी। क्या आप भी ऐसी कथा जानते हैं? कमेंट में शेयर करें!
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✍️ रिपोर्ट : विनय कुमार | 📅 23 दिसंबर 2025 | 📍 कोलकाता
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