जलपाईगुड़ी, 23 मार्च 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार एक ऐसी हाई-प्रोफाइल सीट सामने आई है जहां मां और बेटे के बीच ही मुकाबला हो रहा है।
जलपाईगुड़ी जिले की डबग्राम-फुलबाड़ी विधानसभा सीट पर मां शिखा चटर्जी भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं, जबकि बेटा रंजन शील शर्मा तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरे हैं।
शिखा चटर्जी ने रंजन का लालन-पालन किया है और रंजन भी उन्हें मां मानते हैं। नामांकन से पहले रंजन ने अपनी मां का आशीर्वाद भी लिया था।
मां-बेटे का भावुक रिश्ता
रंजन शील शर्मा के पिता का निधन तब हुआ जब रंजन काफी छोटे थे। रंजन की मां उन्हें लेकर शिखा चटर्जी के पास आईं और उनका ध्यान रखने का आग्रह किया। बाद में रंजन की मां के चल बसे के बाद शिखा ने ही रंजन को अपने बेटे की तरह पाला-पोसा। रंजन आज भी उन्हें “मां” कहकर बुलाते हैं।
शिखा चटर्जी ने न केवल रंजन का पालन-पोषण किया, बल्कि उनकी राजनीतिक यात्रा को आकार देने में भी अहम भूमिका निभाई।
उनके मार्गदर्शन में ही रंजन ने राजनीति में कदम रखा। एक समय दोनों ही तृणमूल कांग्रेस के साथ थे। लेकिन बाद में अंदरूनी मतभेदों के कारण शिखा चटर्जी ने TMC छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गईं। वहीं रंजन TMC में ही रहे।
शिखा चटर्जी का राजनीतिक सफर
शिखा चटर्जी ने 2021 में डबग्राम-फुलबाड़ी सीट से BJP के टिकट पर चुनाव लड़ा और TMC के दिग्गज नेता गौतम देब को हराकर विधायक बनीं। स्थानीय नेताओं ने तब दावा किया था कि रंजन ने अपनी मां के खिलाफ प्रचार नहीं किया था। इस बार दोनों एक-दूसरे के सामने हैं।
चुनावी माहौल में भावनात्मक टकराव
यह सीट अब पूरे बंगाल में चर्चा का विषय बन गई है। जहां शिखा चटर्जी BJP की ओर से जीत का दम भर रही हैं, वहीं रंजन TMC के टिकट पर मजबूत दावेदारी पेश कर रहे हैं। दोनों के बीच का मां-बेटे का रिश्ता चुनावी मैदान में भावनात्मक टकराव बन चुका है।
मां-बेटे का बयान
रंजन शील शर्मा (TMC उम्मीदवार, सिलिगुड़ी नगरपालिका के 37 नंबर वार्ड के पार्षद और दार्जिलिंग जिले से TMC महासचिव): “मैंने मां के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। उन्होंने अंतर्आत्मा से मुझे आशीर्वाद दिया है, मैं ज़रूर जीतूंगा।”
शिखा चटर्जी (BJP उम्मीदवार, निवर्तमान विधायक): “यह मां-बेटे की लड़ाई नहीं है, यह धर्म और अधर्म की लड़ाई है। हम धर्म की जीत चाहते हैं।” “यह व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है। मां-बेटे का यह संबंध पहले भी था, आज भी है, आगे भी रहेगा। लेकिन राजनीति में मत अलग हो सकते हैं। गणतंत्र में यह स्वाभाविक है। मां-बेटे की भावनाएं बड़े होने पर बदल जाती हैं। यहां भी वही हुआ है। हालांकि, मुझे अफसोस है कि मैं अपने बेटे को अपने मत के साथ नहीं जोड़ सकी।”
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