कोलकाता | 13 जनवरी 2026: पश्चिम बंगाल में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले मतुआ समुदाय एक बार फिर गहरे असमंजस और चिंता के दौर से गुजर रहा है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत नामों के सत्यापन की प्रक्रिया ने इस समुदाय के भीतर डर और अनिश्चितता बढ़ा दी है।
एक ओर जहां नागरिकता संशोधन कानून (CAA) की प्रक्रिया अब भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई है, वहीं दूसरी ओर मतुआ समुदाय को यह चिंता सता रही है कि कहीं वे मतदाता सूची से बाहर न हो जाएं और 2026 के चुनाव में मतदान के अधिकार से वंचित न रह जाएं।
ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से लाखों नाम हटे
SIR के तहत जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची से पूरे राज्य में 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। कोलकाता स्थित शोध संस्था साबर इंस्टिट्यूट के आंकड़ों के मुताबिक,

- मतुआ बहुल 15 विधानसभा सीटों में करीब 2.4 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए गए।
- इनमें लगभग 40% नाम मृत घोषित किए गए लोगों के थे।
- करीब 39% मतदाता पलायन कर चुके बताए गए।
- लगभग 22% मतदाताओं का पता नहीं चल पाया।
‘अनमैप्ड’ मतदाता बना सबसे बड़ा डर
इनमें बड़ी संख्या ऐसे मतदाताओं की है, जिन्हें ‘अनमैप्ड’ श्रेणी में रखा गया है। ‘अनमैप्ड’ का मतलब है कि किसी मतदाता का रिकॉर्ड उसके पते या मतदान क्षेत्र से सही तरीके से जोड़ा नहीं जा सका।
इसी वजह से मतुआ समुदाय में यह डर गहराता जा रहा है कि अगर इस बार उनका नाम वोटर लिस्ट में नहीं आया और CAA की प्रक्रिया में और देरी हुई, तो कहीं उन्हें स्थानीय नागरिक ही न मान लिया जाए।
BJP की सक्रियता, भरोसे की परीक्षा
इन हालातों के बीच भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) मतुआ समुदाय तक अपनी पहुंच बनाए रखने और उन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिशों में जुटी हुई है।
मतुआ समुदाय को बीजेपी के लिए एक अहम वोट बैंक माना जाता है, लेकिन अब यह सवाल भी उठने लगा है कि CAA और SIR की प्रक्रियाओं ने इस समुदाय के भरोसे को कमजोर तो नहीं किया है?
“पहले वोट दिया, अब पहचान पर सवाल”
उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, नदिया और उत्तर बंगाल के मतुआ बहुल इलाकों में रहने वाले परिवारों का कहना है कि उन्होंने पहले के चुनावों में नियमित रूप से मतदान किया है, फिर भी अब उनकी नागरिकता और मताधिकार को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि “अगर CAA की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हुई है, तो क्या हमें अस्थायी नागरिक माना जा रहा है?”
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ने बढ़ाई चिंता
मतुआ समुदाय एक प्रमुख अनुसूचित जाति समुदाय है, जो मूल रूप से पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों का समूह रहा है। धार्मिक और सामाजिक उत्पीड़न के चलते इन लोगों ने भारत में शरण ली थी।
पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय की आबादी का अनुमान करीब दो करोड़ तक लगाया जाता है, जिससे यह समुदाय राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है।
मतुआ परिवारों की चिंता
उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, नदिया और उत्तर बंगाल के कई इलाकों में मतुआ परिवारों से बातचीत में यही सवाल बार-बार आता है:
“हमारी नागरिकता की स्थिति क्या है? अगर नाम नहीं रहा तो वोट कैसे देंगे?” कई लोग कहते हैं कि वे पहले चुनावों में वोट दे चुके हैं, लेकिन SIR से डर है कि कहीं मताधिकार छिन न जाए।
चुनावी समीकरणों पर असर की आशंका
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतुआ समुदाय की यह असमंजसपूर्ण स्थिति 2026 के विधानसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सकती है। अगर नागरिकता और मतदाता सूची को लेकर भरोसे का संकट गहराता है, तो इसका सीधा असर चुनावी रुझानों पर पड़ सकता है।
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