बॉलीवुड डेस्क, मुंबई | 28 जुलाई 2026: आज के दौर में खबरें जितनी तेजी से फैलती हैं, उतनी ही तेजी से लोगों के बारे में धारणाएं भी बन जाती हैं। कई बार अदालत का फैसला आने से पहले ही सोशल मीडिया और टीवी स्टूडियो किसी को दोषी या निर्दोष घोषित कर देते हैं।
इसी संवेदनशील और समकालीन विषय को बेहद प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर लेकर आई हैं वरिष्ठ टीवी पत्रकार नीरू शर्मा अपनी पहली निर्देशित फिल्म ‘बांद्रा बॉय’ के साथ।
महज 21 मिनट की यह फिल्म केवल एक शॉर्ट फिल्म नहीं लगती, बल्कि अपनी सशक्त कहानी, प्रभावी प्रस्तुति और दमदार तकनीकी पक्ष के कारण एक संपूर्ण फीचर फिल्म जैसा अनुभव कराती है।
कहानी और थीम
दो दशकों तक मीडिया से जुड़ी रहीं नीरू शर्मा ने अपने अनुभवों को कहानी का आधार बनाते हुए यह दिखाया है कि किस तरह ब्रेकिंग न्यूज़ की होड़ में सच अक्सर पीछे छूट जाता है। फिल्म सच्ची घटनाओं से प्रेरित है और दर्शकों को लगातार यह सोचने पर मजबूर करती है कि अफवाह, मीडिया ट्रायल और जनमत किस तरह किसी की पूरी जिंदगी बदल सकते हैं।
कहानी मशहूर हस्ती सिद्धार्थ ओबेरॉय (अह्वान कुमार) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे पुलिस एक छापे के दौरान हिरासत में लेती है। हालांकि उसके पास से कोई नशीला पदार्थ बरामद नहीं होता और मेडिकल रिपोर्ट भी उसके पक्ष में होती है, लेकिन इसके बावजूद उसे फंसाने का खेल शुरू हो जाता है।
उसके पिता देवराज ओबेरॉय (धर्मेंद्र गोहिल) मामले को खत्म करने के लिए करोड़ों की सौदेबाजी करते हैं। इसी दौरान मीडिया में एक वीडियो क्लिप सामने आती है और कहानी अप्रत्याशित मोड़ ले लेती है। फिल्म का क्लाइमैक्स दर्शकों को चौंकाने में सफल रहता है।
अभिनय और निर्देशन
अभिनय की बात करें तो अह्वान कुमार ने अपने किरदार की उलझन, बेबसी और संघर्ष को प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर उतारा है। वहीं धर्मेंद्र गोहिल अपने अनुभवी अभिनय से हर दृश्य को विश्वसनीय बनाते हैं।
लोचन बरसागड़े, यश पेडणेकर, पवन तिवारी, श्याम थोंबरे, ऐश्वर्या मनोहर और हिमांशी मंडलिया ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।
निर्देशन के स्तर पर नीरू शर्मा की यह पहली फिल्म होने के बावजूद कहीं भी शुरुआती प्रयास जैसी नहीं लगती। उनकी कहानी कहने की शैली परिपक्व है और पटकथा अंत तक दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखती है।
तकनीकी पक्ष
तकनीकी रूप से भी फिल्म मजबूत नजर आती है। कौशल महावीर का बैकग्राउंड स्कोर दृश्यों के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। आयुष शाह की सिनेमैटोग्राफी फिल्म को सिनेमाई विस्तार देती है, जबकि संदीप कुरुप की सटीक एडिटिंग 21 मिनट की अवधि को कहीं भी बोझिल नहीं होने देती।
निष्कर्ष: ‘बांद्रा बॉय’ की सबसे बड़ी ताकत इसका विषय है। यह फिल्म दर्शकों से सवाल करती है कि क्या केवल सुर्खियों के आधार पर किसी की छवि तय कर देना उचित है? क्या मीडिया ट्रायल किसी व्यक्ति के जीवन और करियर को अपूरणीय नुकसान नहीं पहुंचाता?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर New York International Women Festival में विजेता बनने वाली यह फिल्म इस बात का प्रमाण है कि दमदार विषय और ईमानदार प्रस्तुति भाषा और सीमाओं से परे जाकर भी अपनी पहचान बना सकती है।
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