फुरसतों का शहर बनारस…

अर्जुन तितौरिया खटीक, गाजियाबाद : कहीं जाने का मन था किन्तु यक्ष प्रश्न था कहां? इसी बीच मैंने बनारस पर लिखा एक छोटा सा लेख समाचार पत्र में देखा। मैं महादेव का इशारा समझ कर आनन-फानन में बनारस के लिए ट्रेन की टिकट बुकिंग कराने के लिए निकल गया। यूं कई बार इससे पहले मणिकर्णिका जाने का सोचा था, पर कभी प्रोग्राम बन नहीं पाया, क्योंकि बाकी धार्मिक स्थानों के लिए लोगों में जितनी उत्सुकता और श्रद्धा भाव देखता हूं। बनारस के लिए कम ही पाया। दूसरी वजह, मेरी पसंदीदा टॉप 20 फिल्मों में से चार की आत्मा में बनारस है।
1. संघर्ष (पुरानी वाली दिलीप कुमार, संजीव कुमार, बलराज साहनी, वैजयंती माला और सबसे बढ़कर अमज़द खान के पिता जयंत साहब
2. रांझणा (इसमें भी कुंदन ही था)
3. मुक्तिधाम (ललित बहल और आदिल हुसैन) hotel salvation
और
4. मसान (ये तो आप सबनें देखी ही होगी)

बनारस में रहकर समझ में आया कि क्यों मुंबई के अलावा सिर्फ बनारस को इन फिल्मों में जगह नहीं, बल्कि किरदार की तरह अभिव्यक्त किया गया है। बस यही सब सोच विचार के हम एक साथ तीन शहर घूम आए। हां… तीन शहर…
गंगा जी के किनारे घाटों पर बसा हुआ… काशी
घाटों से निकलकर गलियों में रमता हुआ… बनारस
और बनारस की गलियों से बाहर निकल कर आधुनिक होता हुआ… वाराणसी (जिसके लिए हिन्दू, मुसलमान, बौद्ध, जैन प्राणपण से मोदी जी मोदी जी गा रहा है)

दुनिया के हर कोने में जहां जीवन के उत्सव की तैयारी चल रही है, वहां बनारस में मृत्यु का महोत्सव चल रहा होता है।
जीवन की आपाधापी से अलग अगर शांति चाहते हैं या ठहराव को जरूरी मानते हैं, तो आइए बनारस।।
अगर राजा और रंक दोनों को एक साथ देखना हो तो आइए बनारस।।
दशाश्वमेध घाट की भीड़ और रामनगर किले का सन्नाटा दोनों में शांति देखनी है, तो आइए बनारस।।

बनारसी साड़ी, बनारसी पान, बनारस के घाट, बनारस की गलियां, बनारस के पंडे, बनारस की चाट (आलू टिक्की), बनारस के ठग, इस सब के बारे में आपने बहुत पढ़ा सुना होगा, लेकिन जिस चीज से मैं सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ वे थे बनारस के लोग, जी हां, “बनारसिया” बिंदास, मिलनसार, कतई आर-पार। फिर समझ में आया जिसने रांझणा फ़िल्म का बनारसिया गीत लिखा, उसने बनारस को घोट के पी रखा होगा।

दुनिया में आजकल एक बीमारी बहुत बढ़ रही है, डिप्रेशन बनारसिया और चाहे कुछ भी हो सकता है, लेकिन डिप्रेशन का मरीज़ कभी नहीं, बल्कि मुझे तो लगता है कि डिप्रेशन के मरीजों को चार छह महीने बनारस भेज देना चाहिए।
क्या खूबसूरत जगह है और क्या खूबसूरत ज़हनों वाले लोग।

छोटा सा किस्सा बताता हूँ, दोपहर बाद लगभग मेरी ट्रेन बनारस के रेलवे स्टेशन पहुंच चुका था।
ज्यादा घूमने का समय नहीं था। पूछताछ की तो पता चला दशाश्वमेध की आरती देखी जा सकती है। हमने ऑटो पकड़ा, क्योंकि हम पहले ही पता करके गए थे कि गाड़ियों से बनारस कभी नहीं देखा जा सकता या तो ऑटो या पैदल।
हम दोनों रास्ते में बात कर रहे हैं “यार चाय का मन था” “भूख भी लगी है” “मुझे बनारस में जम के पान खाने हैं” ना जाने क्या आंय बाय बक रहे थे हम दोनों।

इतने में भइया ने ऑटो साइड में लगाया। बोले अभी आये। आते हैं तो देखा कि चले आ रहे हैं दोनों हाथों में कुल्लड़ वाली चाय लिए।। हमारे मुंह से बस इतना ही निकला “अरे भैया कहीं और रोक देते कुछ खा लेते” पूरी बात सुने बिना नहीं भैया फिर वापस भग लिए (भाग गए नहीं) अब के आए तो हाथ में मठिया भी थी पता नहीं भूख का असर था या उनके श्रद्धा भाव का, उससे बढ़िया मठिया मैंने आज तक नहीं खाई। हम ऑटो में बैठे चुस्कियां ले ही रहे थे, तीसरी बार फिर भाग गए एक जग में एक्स्ट्रा चाय लेकर आए और हमारे खाली हुए कुल्लड़ दोबारा चाय से भर दिए। हम तो गदगद हो गए।

दशाश्वमेध घाट से पहले वाले गदौलिया चौराहे पर छोड़ दिया, बता दिया कि यहां से पैदल का रास्ता है।
रूपए 100 में बातें हुई थी हम देने लगे तो बोले नहीं, आप काशी विश्वनाथ दर्शन कर आइए, हम यहीं इंतजार करेंगे। भीड़ भरे चौराहे की तरफ देखकर मैंने कहा -भैया हमें समय लगेगा। आप जाइए यह लीजिये पैसे। बोले- नहीं, हम फुरसत में हैं। आप हो आइए दर्शन करके। हम यही मिलेंगे, यह लीजिए हमारा फोन नंबर।
नंबर लेकर मैंने कहा ठीक है आपको ही कॉल करेंगे, लेकिन फिलहाल ये 100 तो ले लीजिए। पर बनारसिया होते पक्के ज़िद्दी होते हैं। हम हाथ में नोट पकड़े खड़े हैं, इतने में तो ऑटो यह जा… वह जा…
हम घंटे-डेढ़ घंटे में लौट के आए और चौराहे पर फोन निकाला और नंबर मिलाने को हुए, इतने में भैया फिर अवतरित हो गए आइए, आइए चलते हैं।

हम इसी सोच में डूबे हुए हैं कि इतनी फुर्सत में यह लोग कैसे कमा कर खाते होंगे। दिल्ली में तो कोई ऑटो वाला ऐसे सौ तो क्या 10 रूपए के लिए भी किसी पर विश्वास ना करें। हमको लगा शायद यह भैया कुछ ज्यादा ही सीधे या मिलनसार हैं, लेकिन अगले 4 दिनों में अदल बदल कर मिले हुए सभी ड्राइवरों ने हमारे विचार में परिवर्तन ला दिया कि बनारसिया एक्के डाई से बने हैं।
सभी ऐसे ही है। सब के सब फुर्सत में रहते हैं। ना आपाधापी न मारकाट। सुबह एक सवारी पकड़ेंगे और शाम तक उसी के साथ घूमते रहेंगे।

और एक कहानी सब सुनाएंगे आपको… कि वारुणी और असि दो नदियों के नाम से बना “वाराणसी” फलाँ मंदिर, फलां घाट… सुनते सुनते ऐसे कंठस्थ हुआ जैसे-मेरी एक टांग नकली है, मैं हॉकी का खिलाडी था।

घाट पर बैठे हैं लोग, वह भी फुर्सत में हैं।
जाम में फंसे हुए लोग भी फुर्सत में खड़े हैं, बगल वाली सवारियों से ऐसे बतियाने लगते हैं, गोया कितने सालों से एक दूसरे को जानते हो। दुकानदार साड़ियां दिखाते हुए फुर्सत में है, ना साड़ियां खोलने में कंजूसी करते हैं, ना वह समेटने की जल्दी करते हैं। आरती से 2 घंटा पहले लोग घाट पर आकर बैठ जाते हैं, बैठे हैं फुर्सत में। जब मैं खुद बैठा तो पता चला कि खुद से संवाद में कितना समय गुजर जाए पता नहीं चलता। बनारस के दुकानदार आपसे कभी चाय नहीं पूछते। बिना पूछे लस्सी मंगवा देते हैं।

जय काशी विश्वनाथ
हर हर महादेव

(नोट : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी व व्यक्तिगत है। इस आलेख में दी गई सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई है।)

अर्जुन तितौरिया खटीक
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