बालुरघाट | 17 अक्टूबर 2025 : दीपांविता अमावस्या के दिन आयोजित होने वाली चकभवानी श्मशान काली बाड़ी की वार्षिक पूजा इस वर्ष 174वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। यह पूजा वीराचारी परंपरा के अनुसार की जाती है, जिसमें रात्रिकालीन अनुष्ठान, बलि, और विशेष भोग शामिल हैं।
बालुरघाट चकभवानी श्मशान काली बाड़ी की काली पूजा अपनी 174वीं वर्षगांठ पर मनाई जा रही है। बालुरघाट चकभवानी श्मशान काली बाड़ी सामाजिक कल्याण समिति के सदस्यों के मार्गदर्शन में इस पूजा की तैयारियाँ जोर-शोर से शुरू हो गई हैं। यह पूजा 1852 में शुरू हुई थी।
🔱 पूजा की परंपरा और अनुष्ठान
- स्थापना वर्ष: 1852
- स्थान: चकभवानी श्मशान, बालुरघाट
- परंपरा: वीराचारी संप्रदाय के अनुसार
- मुख्य अनुष्ठान:
- दीपांविता अमावस्या की रात को माँ काली की पूजा
- बकरे और मेमने की बलि
- उबली हुई शोल मछली और मेमने के मांस से भोग
- अगले दिन सुबह से दोपहर तक माँ को भोजन अर्पण
- प्रसाद वितरण
हर साल दीपांविता अमावस्या के दिन, वीराचारी के अनुसार काली की वार्षिक पूजा पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ की जाती है। पूजा के दिन, शाम को भोग लगाने के बाद रात में माँ की पूजा की जाती है।
बकरे और मेमने की बलि के साथ, उबली हुई मछली, शोल मछली और मेमने के मांस से माँ की पूजा की जाती है। पूजा के अगले दिन सुबह से दोपहर तक माँ को भोजन वितरित किया जाता है।
🎶 सांस्कृतिक आयोजन
- शिवरात्रि पर शिव पूजा और गान
- चैत्र संक्रांति पर बाउल कीर्तन
- सामाजिक कल्याण समिति के मार्गदर्शन में आयोजन
दीपांविता अमावस्या के अलावा, यहाँ काली पूजा के साथ माँ का प्रसाद वितरित किया जाता है। शिवरात्रि पर शिव पूजा के अलावा, वे काली की पूजा करते हैं, शिव का गान गाते हैं और चैत्र संक्रांति पर बाउल कीर्तन करते हैं।
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