108 साल पुरानी कोलकाता की ऐतिहासिक पूजा कमेटी पर बड़ा फैसला, याचिकाकर्ता की अर्जी खारिज
कोलकाता हिन्दी न्यूज | 16 सितम्बर 2026: कोलकाता की ऐतिहासिक बागबाजार सर्वजनिन दुर्गापूजा समिति के गठन को लेकर चल रहा विवाद आखिरकार समाप्त हो गया है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए पूजा कमेटी के गठन की प्रक्रिया को सही करार दिया और निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
न्यायमूर्ति हिरण्मय भट्टाचार्य की अदालत ने याचिकाकर्ता रविशंकर सेनगुप्ता की अर्जी खारिज कर दी। इससे बागबाजार दुर्गापूजा समिति के चुनाव और कमेटी गठन को लेकर पिछले कई दिनों से चला आ रहा कानूनी विवाद समाप्त हो गया।
77 मतदाताओं में से 66 ने किया मतदान
निचली अदालत के निर्देश पर 30 अगस्त को दो विशेष पर्यवेक्षकों की निगरानी में पूजा कमेटी के चुनाव कराए गए थे। कुल 77 मतदाता सूची में शामिल थे, जिनमें से 66 सदस्यों ने मतदान किया।
चुनाव के दौरान सबसे बड़ा पेच तब सामने आया, जब महासचिव पद के दोनों प्रमुख उम्मीदवारों को बराबर 33-33 वोट मिले। खास बात यह थी कि दोनों उम्मीदवार एक ही परिवार के दो भाई—गौतम नियोगी और भास्कर नियोगी—थे।
दोनों को समान वोट मिलने के कारण तत्काल किसी एक को विजेता घोषित नहीं किया जा सका और समिति गठन की प्रक्रिया और अधिक जटिल हो गई।
कार्यकारिणी सदस्यों के चुनाव में भी हुआ टाई
महासचिव पद के अलावा 12 कार्यकारिणी सदस्यों के चुनाव में भी चार उम्मीदवारों को 32-32 वोट मिले। इस कारण वहां भी बराबरी की स्थिति बन गई। हालांकि, कोषाध्यक्ष पद पर निर्विरोध या स्पष्ट परिणाम के साथ चुनाव पूरा हो गया था।
चुनाव में उत्पन्न इस असामान्य स्थिति के बाद दोनों पक्षों के बीच मतभेद बढ़ गए और मामला दोबारा अदालत तक पहुंचा।
कास्टिंग वोट को लेकर बढ़ा विवाद
स्थिति को सुलझाने के लिए अदालत द्वारा नियुक्त दोनों पर्यवेक्षकों ने संबंधित पक्षों को आपसी सहमति से समाधान निकालने की सलाह दी। एक पक्ष का कहना था कि बराबरी की स्थिति में अध्यक्ष अपने कास्टिंग वोट का इस्तेमाल कर सकते हैं।
दूसरे पक्ष ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद मामला फिर निचली अदालत में पहुंचा। निचली अदालत ने फैसला सुनाया कि बराबरी की स्थिति में अध्यक्ष अपने मतदान अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं।
पर्यवेक्षकों पर पक्षपात का आरोप, हाई कोर्ट में चुनौती
निचली अदालत के फैसले के बाद दोनों भाइयों में से एक ने अदालत द्वारा नियुक्त दोनों पर्यवेक्षकों पर गंभीर पक्षपात का आरोप लगाते हुए हाई कोर्ट का रुख किया। इसके साथ ही एक महिला सदस्य ने मतदान केंद्र पर कथित अव्यवस्था, विवाद और धक्का-मुक्की की शिकायत भी की।
10 सितंबर को न्यायमूर्ति हिरण्मय भट्टाचार्य की अदालत में मामले की सुनवाई हुई थी, लेकिन फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। मंगलवार को अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि कमेटी गठन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।
1919 में शुरू हुई थी बागबाजार की ऐतिहासिक दुर्गापूजा
बागबाजार की दुर्गापूजा का इतिहास 100 साल से भी अधिक पुराना है। वर्ष 1919 में 55, बागबाजार स्ट्रीट पर इस पूजा की शुरुआत हुई थी। उस समय इसे ‘नेबूबागान बारोयारी दुर्गापूजा’ के नाम से जाना जाता था।
इसके बाद पूजा का आयोजन पशुपति बोस लेन और बागबाजार काली मंदिर के आसपास के क्षेत्रों में भी हुआ। बाद में यह पूजा स्थायी रूप से बागबाजार क्षेत्र में स्थापित हुई और ‘बागबाजार सर्वजनिन दुर्गोत्सव’ नाम से समिति का गठन किया गया।
कई ऐतिहासिक वर्षों में हुए समिति के चुनाव
वर्ष 1930 में दुर्गाचरण बंद्योपाध्याय को समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। वर्ष 1932 में बागबाजार की दुर्गापूजा को सोसाइटी एक्ट के तहत पंजीकृत किया गया।
इसके बाद 1996, 2004, 2006 और 2010 में समिति के चुनाव हुए। लंबे अंतराल के बाद चुनाव प्रक्रिया को लेकर विवाद खड़ा हुआ, जो अंततः अदालत तक पहुंचा।
अब हाई कोर्ट के फैसले के बाद 108 वर्ष पुरानी इस ऐतिहासिक दुर्गापूजा समिति के प्रबंधन को लेकर कानूनी गतिरोध समाप्त होने की उम्मीद है।
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