“विकास की आड़ में क़त्ल”
अरावली कोई लकड़ी नहीं
जो समय देखकर काट ली जाए,
ये वह दीवार है
जिसके सहारे
शहर अब तक साँस ले पाया।
काग़ज़ों में अनुमति है,
ज़मीन पर घाव—
फ़ाइलों की स्याही से
पेड़ों का लहू टपकता है,
और नाम दिया जाता है—
विकास।
कहते हैं— सब नियमों के तहत है,
जंगल पूछता है—
नियम किसके लिए?
पहाड़ चुप हैं,
इसी चुप्पी का
फ़ायदा उठाया जा रहा है।
जो बचाने की बात करता है
वह “अड़चन” कहलाता है,
और जो काटने का रास्ता दिखाए
वह सम्मान पाता है।
यहाँ पेड़ नहीं गिरते,
यहाँ भरोसा गिरता है—
संविधान की छाया में
मुनाफ़े की फसल उगती है।
कल जब पानी कम होगा,
हवा भारी होगी,
तो कहा जाएगा—
यह तो समय की मार है।
नहीं,
यह समय की नहीं,
निर्णयों की मार है।
याद रखा जाए—
अरावली अचानक नहीं कटेगी,
उसे धीरे-धीरे
दस्तख़तों से हटाया जाएगा।
यह कविता आरोप नहीं,
चेतावनी है।
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