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बाबा : बाप के भी बाप होते हैं

विनय सिंह बैस, नई दिल्ली। हम लोग जिस पीढ़ी के हैं उसमें पिता के सामने तमाम मजबूरियां रहती थी। वह चाहते हुए भी अपने बेटे को सबके सामने दुलार नहीं सकता था, प्यार नहीं कर सकता था। पूरे परिवार, मुहल्ले, गांव के सामने अपने ही बेटे को दुलराने से उसे कमजोर समझा जाता था, मेहरा समझा जाता था। इसलिए उसे कठोर दिखना पड़ता था, दिखावे के लिए ही सही डांटना-फटकारना पड़ता था।

बेटे को भी पिता के साथ होने पर डर यह रहता था कि जब तक दुलार कर रहे हैं, देवता संऊ (सीधे) हैं, तब तक तो सब ठीक है लेकिन गुस्सा आया, अंदर का बाप जाग गया तो पीट-पाट देंगे। मांग, जिद भी वही मानेंगे जो उन्हें ठीक लगेगी या जेब अनुमति देगी। नहीं तो सीधे न कह देंगे। न मतलब न, फिर कोई सुनवाई नहीं।

बाबा (दादा) के पास ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती थी। वह पोते को सार्वजनिक रूप से दुलार कर सकते थे, प्यार कर सकते थे। कंधे पर बिठा सकते थे, खंत-मतैया कर सकते थे। अपने साथ सुला सकते थे, कहानी सुना सकते थे।

बाबा के पास पोता कुछ भी जिद कर सकता था, कोई भी अंट-शंट मांग कर सकता था क्योंकि उसकी ज्यादातर मांगे पूरी होनी होती थी। न भी हुई तो झिड़की तो नहीं ही मिलनी थी। बस आश्वासन मिलना था कि अगली बार दिला देंगे, कल खरीद देंगे।

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सबसे बड़ी बात यह कि बड़े से बड़ा अपराध करके यदि पोता दरवाजे तक, बाबा की गोद तक जाने में सफल रहा तो समझो उसे अभयदान मिल गया। क्योंकि अम्मा की फायरिंग रेंज घर की देहरी तक ही होती थी और पिताजी की हिम्मत नहीं थी कि बाबा के पास जाकर अपने ही बच्चे को पीट दें। क्योंकि बाबा, बाप के भी बाप होते थे। शहरों के 2 bhk फ्लैट में, एकल परिवार में रहने वाले अभागे बच्चे शायद ही दादा-पोते के इस प्यार को, इस बॉन्डिंग को समझ पाएं।

विनय सिंह बैस, लेखक/अनुवाद अधिकारी

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