श्रीराम पुकार शर्मा, कोलकाता। प्रातः वंदनीय गोस्वामी तुलसीदास जी अपने समय के केवल एक सर्वश्रेष्ठ कवि ही नहीं, केवल श्रेष्ठ भक्त ही नहीं, केवल महान दार्शनिक ही नहीं, बल्कि वे लोक जीवन के आदर्शों के महान व्याख्याता रहे हैं। उनके द्वारा प्रदर्शित आदर्शों को ही मूल आधार बनाकर ही आज हमारे समाज, साहित्य और दर्शन पल्लवित-पुष्पित हो रहे हैं। उनकी वाणी केवल काव्य नहीं, बल्कि लोक जीवन का आलोक है। उनके शब्द और पद केवल पढ़ने के लिए नहीं हैं, बल्कि उन्हें जीने के लिए है।
जितना उनका पाठ किया जाए, उससे अधिक उनका मनन करना अनिवार्य है; तभी उनके भाव, उनके ग्रंथों से निकलकर लोक जीवन का मार्गदर्शन करते रहेगा। भक्त शिरोमणि की सर्वोत्कृष्ट रचना ‘रामचरितमानस’ की प्रत्येक पंक्तियाँ अपने भीतर गहन जीवन-दर्शन को समाहित की हुई है। उनमें केवल रामनाम की अभिव्यक्ति मात्र ही नहीं है, बल्कि उनमें भारतीय सभ्यता, संस्कृति, दर्शन और मनोविज्ञान का समन्वित स्वर निहित है।
“रामचरितमानस” के ‘बालकाण्ड’ में शिव-पार्वती प्रसंग से सम्बन्धित भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास की एक बहु चर्चित चौपाई है –
“होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥”
यह बहुचर्चित चौपाई भगवान शिव जी द्वारा माता सती से कही गई है। माता सती के मन में श्रीराम के दिव्य स्वरूप को लेकर संशय-भाव उत्पन्न हो गया, जिसको समझने के लिए उनका मन तर्कों में उलझा रहा। लेकिनकुछ भी स्पष्ट न हो सका। तब भगवान शिव जी उन्हें समझाते हुए कहते हैं – ‘जो राम ने रच रखा है, वही होगा; व्यर्थ तर्क की शाखाएँ बढ़ाने से क्या लाभ?’
अर्थात, सब कुछ राम (ईश्वर) की कृपा पर ही निर्भर है।
फिर, जब भरत जी अपने पूज्य भ्राता श्रीराम को वन से अयोध्या वापस लिवा लाने के लिए जाते हैं, और उस स्थान पर पहुँचते हैं, जहाँ श्री राम और सीता जी ने कुशा बिछाकर शयन किया था। उसे देखकर भरत का कोमल भ्रातृत्व हृदय भाव-विह्वल हो जाता है। उनका मानना था कि जो श्रीराम जी स्वयं सुख के सागर हैं, रघुवंश के शिरोमणि है, सब तरह से मंगल के भंडार हैं, जिन्हें माताएँ अपने पलकों में बहुत ही संभाल कर रखती थीं तथा प्रजाजन जिनके दर्शन को पाकर कृतार्थ हो जाया करती थीं, सबके प्रिय वही श्रीराम जी आज निर्जन वन में पैदल फिर रहे हैं और कंद-मूल-फल खा रहे हैं। विधाता की कार्य-गति बहुत ही बलवान है, जो किसी को पलभर में राजा बना देवे और फिर किसी राजा को पलभर में वनवासी बना देता है।
“सुखस्वरुप रघुबंसमनि, मंगल मोद निधान।
ते सोवत कुस डासि महि, बिधि गति अति बलवान॥” – अयोध्याकाण्ड, 200
इन दोनों पदों को लोग ‘भाग्यवादिता’ के प्रबल प्रेरक के रूप में देखते हैं। केवल उपरोक्त दो ही नहीं, बल्कि “रामचारितमानस” में ऐसे साधारण लौकिक भाग्यवाद से सम्बन्धित ढेरों पद यत्र-तत्र मिलते हैं। तो फिर इसका अर्थ क्या यह मान लिया जाए कि “जो मिल गया, वही पर्याप्त है, उसी को स्वीकार कर संतुष्ट हो जाए और आगे बढ़ने का प्रयास छोड़ देवें?”
तो इसका उत्तर स्पष्ट रूप से है – ‘नहीं’।
पहली नजर में ये पद ‘भाग्यवादिता’ को प्रोत्साहन करने वाला लग सकते हैं। लेकिन अगर इसके गहरे आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक अर्थों का अन्वय और मनन किया जाए, तो “रामचारितमानस” की ऐसी उक्तियाँ मनुष्य को आलस्य और भाग्यवादिता की प्रेरणा नहीं देती हैं, बल्कि मानसिक रूप से उसकी मजबूती और कर्मठता को प्रेरित करती हैं। पर साधारण मनुष्य ऐसी उक्तियों के बाह्य सरल अर्थ को ही ग्रहण कर संतुष्ट हो जाता है कि ‘जब सब कुछ विधाता ने पहले से तय कर रखा है, तो फिर मेहनत या कोशिश करने का क्या प्रयोजन?’
नतिजन उसे अक्सर असफलता का ही सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में मनुष्य अपनी कमियों को ढूँढने या सुधारने की कोई कोशिश न कर ‘विधाता की यही इच्छा थी’ मानकर निष्क्रिय चुपचाप बैठ जाता है, जो उनकी प्रगति को रोकता है, उसमें निराशवादिता और तनाव को जन्म देता है। इसके साथ ही वह जगत के सामान्य विकास क्रम को भी बाधित करता है।
किंतु जब ऐसे उक्तियों को ‘रामचरितमानस’ के समग्र चिंतन, उसके प्रसंग और भक्तकवि की अन्य उक्तियों के आलोक में देखा जाता है, तब उनका अर्थ कहीं और अधिक व्यापक और जीवनोपयोगी साबित होता है। तब ऐसे कथन किसी दार्शनिक भाग्यवादिता की स्थापना न कर एक विशिष्ट मानसिक स्थिति में अनावश्यक तर्क-वितर्क से बचने और प्रबलता से कर्म करने के लिए उपदेशक बन जाते हैं।
“भविष्य-अज्ञान सिद्धांत” अर्थात् – ‘भविष्य की अज्ञानता’ ही पुरुषार्थ के कारण बनते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार मनुष्य अपने भविष्य से सदैव अनभिज्ञ रहता है। यदि भविष्य के रहस्य उसके सामने पहले से ही खुल जाए, तब तो वह भाग्य के भरोसे बैठे, केवल फल की प्राप्ति के लिए न तो परिश्रम करेगा, न अपने भविष्य के लिए कोई योजना बनाएगा और न जीवनगत या सांसारिक समस्याओं को दूर करने की कोई कोशिश ही करेगा।
विद्यार्थी इसलिए पढ़ता है कि उसे भविष्य में सफलता की आशा है; खिलाड़ी इसलिए जोशपूर्वक खेलते हैं कि उनमें उन्हें अपनी जीत की आशा किरण दिखाई देती है, किसान इसलिए खेती करता है कि उसे अच्छे फसल की आशा है; मजदूर इसलिए परिश्रम करता है कि उसे उचित धन प्राप्ति की आशा है । फल प्राप्ति की कल्पना ही मनुष्य में पुरुषार्थ का जागृत करता है, अन्यथा वह उत्साह से हीन होकर ‘निराशावादी’ बन जाएगा। इस लोक में जो मनुष्य जैसा कर्म करता है, वह वैसा ही उसका फल को प्राप्त करता है। भाग्य से ज्यादा मनुष्य के कर्म और आचरण ही उसका भविष्य (फल) को तय करते हैं।
‘रामचरितमानस’ के ‘अयोध्याकाण्ड’ में चित्रकूट के कमदगिरि पर्वत के समीप मंदाकिनी नदी के तीर पर ‘भरत मिलाप’ प्रसंग में ‘कर्मवाद’ की प्रधानता को स्पष्ट करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने संसार को ‘कर्म प्रधान’ ही माना है –
“करम प्रधान बिस्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥” – अयोध्याकाण्ड, 219
भक्त शिरोमणि तुलसीदास ने ‘कर्म’ को ही संसार की सम्पूर्ण व्यवस्था का मूल आधार माना है। यह भी निश्चित है कि जो जैसा करता है, उसी के अनुरूप ही उसे फल की प्राप्ति होती है। इसलिए ‘सब कुछ विधाता द्वारा पूर्व निश्चित है, अतः कर्म की कोई आवश्यकता नहीं है’ को ही परम सत्य मानकर बैठ जाना, अपने आप को और जगत को धोखा देना है। ऐसी मनोवृति तुलसीदास के समग्र चिंतन के प्रतिकूल है।
तब प्रश्न उठता है कि “होइहि सोइ जो राम रचि राखा” का अभिप्राय क्या है?
इसका उत्तर लोक जीवन के कर्म और उसके अनुभव में निहित है। मनुष्य कर्म करता है, पर फल या परिणाम की प्राप्ति केवल उसके कर्म से ही निर्धारित नहीं होते हैं, बल्कि उसको समय, परिस्थिति, प्रकृति, समाज, कई अन्य कारक आदि भी प्रभावित करते हैं, जो प्रायः कार्यकर्ता के नियंत्रण से बाहर के होते हैं। तभी न हाथ में आया मछली, छिटककर गहरे पानी में चला जाता है। मनुष्य अपने पुरुषार्थ का स्वामी तो हो सकता है, परंतु उसके परिणाम का स्वामी कदापि नहीं।
जब मनुष्य अपना सर्वोत्तम प्रयास कर चुका होता है, तब भी वांछित परिणाम के लिए उसके मन में शंकाओं का अंतर्द्वंद्व चलता ही रहता है। उसमें उसे अपने पुरुषार्थ के प्रति कोई न कोई संदेह रह जाता है। ऐसी स्थिति में वह ईश्वर या किसी अदृश शक्ति के प्रति आशावान हो जाता है । यही वह स्थान है, जहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी ने ईश्वर या अदृश्य शक्ति की व्यापक व्यवस्था का स्मरण कराया है। तब “रामचरितमानस” के ऐसे पद या उक्तियाँ, मनुष्य को असफलता या विपत्ति के समय धैर्य, संतुलन और ईश्वर के प्रति विश्वास का मार्ग दर्शन कराते हैं।
यही कारण है कि “करम प्रधान विश्व करि राखा” और “होइहि सोइ जो राम रचि राखा” दोनों परस्पर विरोधी सिद्धांत न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं । पहली चौपाई जहाँ मनुष्य को कर्म के लिए प्रेरित करती है, वहीं दूसरी चौपाई उसे फल के अहंकार और विषाद से मुक्त करती है। एक पुरुषार्थ का उद्घोषक है, तो दूसरी समत्व का उपदेशक है। तुलसीदास का यह संदेश अत्यंत ही संतुलित जीवन-दृष्टि को प्रदान करता है कि पूर्ण निष्ठा से कर्म करो, पर परिणाम को लेकर अपने मन को व्यथित न करो, बल्कि पुनः पुरुषार्थ या कर्म करो; और जहाँ परिणाम तुम्हारे अधिकार से बाहर हो, वहाँ उसे ईश्वर की व्यापक व्यवस्था का अंग मानकर स्वीकार करो और पुनः प्रयास करो । यहाँ स्वीकार का अर्थ कर्म से पराजय से नहीं, बल्कि मानसिक परिपक्वता से है और कर्म-कर्ता के अगले पुरुषार्थ की तैयारी से है। यही मानसिक संतुलन गोस्वामी जी तुलसीदास की और उनके “रामचरितमानस” की शाश्वत जीवन-दृष्टि है।
गोस्वामी तुलसीदास स्वयं इसके सबसे बड़े प्रमाण हैं। यदि वे केवल “होइहि सोइ जो राम रचि राखा” सिद्धांत को ही मानते और उसके संदेश को ही परम सत्य के रूप में स्वीकार करते, तो फिर वे “रामचरितमानस” जैसी महान कृति की रचना के लिए वे अथक साधना ही क्यों करते? महाकथा में सब कुछ जानते हुए भी श्रीराम स्वयं वनवास को स्वीकार करते हैं। वन में जाकर निष्क्रिय नहीं बैठते रहते हैं। वे वहाँ कर्म करते हैं, ऋषियों की रक्षा करते हैं, सुग्रीव से मित्रता करते हैं, समुद्र पर सेतु बनवाते हैं और रावण का वध कर सर्वत्र रामराज्य की स्थापना करते हैं। इसलिए इस पंक्ति का आशय निष्क्रिय संतोष नहीं, बल्कि परिणाम की चिंता से मुक्त होकर निरंतर पुरुषार्थ करना है।
“श्रीरामचरितमानस” के ‘उत्तरकांड’ में श्रीरामभक्त शिरोमणि तुलसीदास ने रामराज्य की महिमा और आदर्श सामाजिक व्यवस्था का आदर्श चित्रांकन किया है। सभी मनुष्य वेदों द्वारा प्रदर्शित नीति-नियम के अनुसार अपने-अपने कर्मों को निरंतर करने में लगे हुए हैं। फलतः चतुर्दिक विकास हो रहा है। लोग रोगमुक्त और प्रसन्नचित हैं। कहीं कोई राग-द्वेष या संताप भाव नहीं है। समाज में किसी से कोई भय या द्वेष नहीं है। सभी लोग परस्पर निष्कपट प्रेम करते हैं। रामराज्य में ऐसा इसलिए सम्भव हुआ, क्योंकि लोग केवल भाग्यवादी न होकर कर्मवादी बनकर अपने-अपने सत् कर्म को कर रहे थे।
“दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
निज निज कर्म निरत श्रुति रीती। निर्मय सब नर करहिं प्रीति॥”
अंततः कहा जा सकता है कि “होइहि सोइ जो राम रचि राखा” को यदि अकेले चौपाई के रूप में पढ़ा जाए, तो उसमें अपूर्ण शिक्षित पाठक को भाग्यवाद की झलक मिल सकती है; परंतु ‘रामचरितमानस’ के समग्र संदर्भ में इसका अध्ययन करने से उसका अर्थ भिन्न हो जाता है। यह चौपाई मनुष्य को कर्म से कदापि विमुख नहीं करती है, बल्कि कर्म के पश्चात् मन को समत्व में स्थापित करने का आध्यात्मिक सूत्र प्रदान करती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘भाग्य’ और ‘कर्म’ सम्बन्धित स्थापित अपने दोनों सिद्धांतों के संयुक्त स्वरूप को ही लौकिक जीवन का परम उद्देश्य बताया है। उन्होंने अपने महाकाव्य “रामचरितमानस” के ‘अयोध्याकाण्ड’ के चित्रकूट प्रसंग में महारानी और श्रीराम की जननी कैसल्या के माध्यम से स्पष्ट कहा है कि कर्म की गति बहुत ही कठिन और जटिल होती है, जिसे केवल भाग्य-विधाता ही जानते हैं। वही सभी कर्म करने वालों को शुभ और अशुभ कर्मों के आधार पर ही उनके अनुरूप उचित फल प्रदान करते हैं –
“कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता॥”
महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार ‘मनुष्य का धर्म पुरुषार्थ है और ईश्वर का क्षेत्र परिणाम प्रदान करना है।’ इसमें पुरुषार्थ प्रत्यक्ष हो सकता है, पर परिणाम परोक्ष ही रहता है । इन दोनों के मध्य में जो विश्वास, धैर्य और समत्व भाव उत्पन्न होता है, उसी का नाम है –
“होइहि सोइ जो राम रचि राखा।”
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