अशोक वर्मा “हमदर्द”, कोलकाता। श्मशान घाट की हवा उस दिन कुछ अलग ही थी। वह हवा जो आमतौर पर पत्तों को सरसराती है, आज मानो खुद चुपचाप खड़ी थी। राख से सनी जमीन, जलती लकड़ियों की गंध, और लोगों की आंखों में पसरा सन्नाटा… सब मिलकर एक ऐसी तस्वीर बना रहे थे जो किसी के भी दिल को भारी कर दे।
बीच में एक चिता रखी थी। सफेद कपड़े में लिपटा रामनाथ का शरीर। वही रामनाथ जो जीवन भर अपने परिवार के लिए जीता रहा। उसके माथे की लकीरों में मेहनत की कहानियाँ थीं, उसके हाथों की कठोरता में त्याग की गवाही। वह आदमी जिसने अपनी जरूरतों को कुर्बान कर बेटों की जरूरतें पूरी की, आज सब कुछ छोड़कर चला गया था।
गांव का हर आदमी जानता था कि रामनाथ ने अपनी ईमानदारी और मेहनत से ही जिंदगी गुजारी थी। दफ्तर में क्लर्क की नौकरी थी, ज्यादा वेतन नहीं, लेकिन गांव में उसका नाम इज्जत से लिया जाता था। लोग कहते – “रामनाथ बाबू बड़े सीधे आदमी हैं। झूठ, धोखा उनके स्वभाव में नहीं है।”
श्मशान की भीड़ में खामोशी थी। लोग एक-दूसरे से फुसफुसा रहे थे, पर कोई जोर से कुछ नहीं बोल रहा था। सबकी आंखों में सिर्फ दुख और मौन था। लेकिन असली पीड़ा उस घर में थी, जो अब सूना लगने लगा था।
पत्नी गीता घर के आंगन में बैठी थी। सफेद साड़ी में लिपटी, माथे पर राख जैसी सफेदी और आंखों में खून की तरह सूखी लकीरें। उसकी आंखों से आंसू बहते-बहते थक चुके थे। पास में बैठी कुछ औरतें उसे संभालने की कोशिश कर रही थीं।
“दीदी, हिम्मत रखो,” एक औरत ने धीरे से कहा। गीता ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा, आवाज में दर्द का पहाड़ था- “कैसे रखूं हिम्मत? मेरा राम चला गया…और मेरा बड़ा बेटा… वो जेल में है। अब ये घर कौन संभालेगा?”
एक दूसरी औरत ने उसके कंधे पर हाथ रखा- “दीदी, भगवान बड़ा है, सब ठीक कर देगा।”
गीता की आंखों में गुस्सा और आंसू साथ-साथ भर गए –
“कौनसा भगवान? जिसने एक पति को छीन लिया, दूसरे को सलाखों के पीछे डाल दिया?”
वह रोते-रोते जमीन पर गिर गई।
उधर श्मशान में अचानक हलचल हुई। दूर से आती पुलिस की जीप की आवाज ने माहौल बदल दिया। लोगों की फुसफुसाहट तेज हो गई।
“लगता है बड़ा बेटा आया है… पुलिस के साथ।”
जीप रुकते ही सबकी नजरें उसकी ओर टिक गई। दो सिपाही उतरे और उनके बीच एक युवक। चेहरे पर थकान, आंखों में गहरा खालीपन। लेकिन जो सबसे ज्यादा चुभ रहा था, वह थी उसकी कलाईयों में बंधी हथकड़ियां।
वह सुरेश था – रामनाथ का बड़ा बेटा।
गांव के लोग उसे देखकर सन्न रह गए। कभी यही सुरेश इस घर का अभिमान था। बचपन में बहुत होशियार, स्कूल में अच्छे नंबर लाने वाला। मोहल्ले के लोग रामनाथ को बधाई देते – “बाबूजी, आपका बड़ा बेटा तो बड़ा नाम करेगा।”
रामनाथ गर्व से मुस्कुराते। गीता सोचती – “ये मेरा बुढ़ापा संभालेगा।” लेकिन वक्त ने सब कुछ बदल दिया।
सुरेश की नजर जैसे ही चिता पर पड़ी, उसकी आंखें छलक पड़ीं। उसका शरीर कांपने लगा। होंठों से सिर्फ एक टूटी हुई आवाज निकली—
“पापा…”
छोटा बेटा राकेश, जो अब तक मजबूती से खड़ा था, यह दृश्य देखकर टूट गया। वह दौड़कर सुरेश से लिपट गया। “भैया…” उसकी आवाज में दर्द ऐसा था कि आसमान भी पिघल जाए।
सुरेश हथकड़ियों में बंधे हाथों से भाई को कसकर पकड़ने की कोशिश करता रहा। दोनों की सिसकियां श्मशान की खामोशी को चीरती हुई गूंजने लगीं। वहां खड़े पुलिसकर्मी भी इस नजारे को देखकर अपनी आंखें पोंछ रहे थे।
राकेश ने रोते हुए कहा—
“भैया, पापा तुम्हारा इंतजार करते-करते चले गए। वो हर रोज कहते थे कि मेरा बेटा सुधर जाएगा। काश तुम एक बार उनकी बात मान लेते।”
सुरेश के आंसू अब रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। “राकेश… मैंने सब बर्बाद कर दिया। पापा को मारने वाला कोई है तो वो मैं हूं। काश मैं उनकी बात मान जाता।”
श्मशान में मौजूद बुजुर्ग धीरे से सिर हिलाते रहे। “गलत रास्ते का यही अंजाम है,” एक बुजुर्ग ने बुदबुदाया।
रामनाथ ने सुरेश को कई बार समझाया था। “बेटा, मेहनत में वक्त लगता है, लेकिन सच्ची कमाई हमेशा इज्जत देती है। गलत रास्ते का पैसा सिर्फ बर्बादी लाता है।”
लेकिन सुरेश हर बार कहता, “पापा, जमाना बदल गया है। मेहनत से कोई अमीर नहीं बनता।”
धीरे-धीरे उसकी संगत खराब हो गई। पहले दोस्तों के साथ बाइक रेसिंग, फिर शराब, फिर छोटे-मोटे झगड़े। एक दिन खबर आई कि सुरेश चोरी के आरोप में पकड़ा गया है।
रामनाथ थाने पहुंचे। बेटे को हथकड़ियों में देखकर उनकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। उन्होंने लोगों के आगे हाथ जोड़े, किसी तरह जमानत कराई। घर लौटते हुए बोले—
“बेटा, अब कसम खा लो कि कभी ऐसा काम नहीं करोगे।”
सुरेश बोला – “पापा, अब सब छोड़ दूंगा।”
लेकिन यह वादा झूठा निकला।
कुछ महीनों बाद फिर खबर आई। इस बार मामला और बड़ा था- अवैध हथियार और लूट का केस। रामनाथ की नींद उड़ गई। मां गीता की आंखों से आंसू सूखने का नाम नहीं ले रहे थे। राकेश भाई को समझाने की कोशिश करता- “भैया, घर लौट आओ। मां बीमार हो रही हैं।”
लेकिन सुरेश अब जुर्म की दुनिया में गहरे धंस चुका था।
रामनाथ का दिल आखिरकार टूट गया। एक दिन दफ्तर में बैठे-बैठे वह अचानक गिर पड़े। दिल का दौरा पड़ा। अस्पताल में डॉक्टर ने कहा,
“अब कुछ नहीं हो सकता।”
यह सुनकर राकेश का दिमाग सुन्न पड़ गया। उसने मां को गले लगाकर बताया। गीता ने बेटे की लाश देखने से पहले ही करुण चीख में अपना होश खो दिया।
अब सुरेश को खबर देना जरूरी था। वह जेल में था। कोर्ट से अनुमति ली गई, तब पुलिस ने उसे अंतिम संस्कार में लाया।
पुलिसकर्मी ने उसकी हथकड़ियां खोलीं। “जल्दी करो। ज्यादा समय नहीं है।”
सुरेश ने कांपते हुए मुखाग्नि के लिए लकड़ी उठाई। उसे लगा जैसे यह लकड़ी नहीं, पिता की उम्मीदों का बोझ है। उसने चिता पर लकड़ी रखी और फूट पड़ा।
“पापा, माफ कर दो। मैं आपका अच्छा बेटा नहीं बन सका। मेरी वजह से आप टूट गए। काश मैं आपकी बात मान जाता।”
राकेश भी उसके पास बैठकर रोने लगा। “भैया, मां कह रही थी कि पापा रोज तुम्हारा नाम लेते थे। वो बस यही चाहते थे कि तुम वापस अच्छे रास्ते पर आ जाओ। लेकिन तुमने उन्हें कभी चैन नहीं दिया।”
सुरेश घुटनों के बल गिर गया।
“राकेश, मैं अब कभी लौट नहीं पाऊंगा। बस मां का ख्याल रखना। उन्हें कभी अकेला मत छोड़ना।”
उधर घर पर गीता बार-बार यही कह रही थी- “अरे राम, तुम क्यों चले गए? अब कौन संभालेगा इस टूटे हुए घर को?”
चिता की लपटें आसमान को छू रही थीं। वहां खड़े लोग चुप थे, पर हर किसी के दिल में यह बात गूंज रही थी- “गलत रास्ते का अंजाम यही होता है।”
पुलिस कर्मी ने धीरे से सुरेश के कंधे पर हाथ रखा। “चलो, अब समय हो गया है।”
सुरेश ने आखिरी बार चिता की ओर देखा, भाई को गले लगाया और जीप में बैठ गया। जीप धीरे-धीरे चली गई। पीछे रह गई सिर्फ राख, धुआं और एक टूटा हुआ घर।
गांव के लोग अब भी खामोश थे। बुजुर्गों ने धीरे से कहा- “जुर्म की मंजिल कभी घर नहीं होती। वह सिर्फ जेल और पछतावे तक जाती है।”
रामनाथ का चेहरा चिता की लपटों में जैसे यह संदेश दे रहा था- “बेटे, समय रहते संभल जाओ। वरना पछताने के सिवा कुछ नहीं बचेगा।”
घर तड़पता है बाहर और बेटा तड़पता है सलाखों के पीछे। यही सबसे बड़ी सजा है।

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