Death

अशोक वर्मा “हमदर्द” कि दिल को छूने वाली कहानी – आखिरी चिट्ठी

कोलकाता। गाँव का नाम था पिपरा घाट, गंगा किनारे बसा हुआ एक पुराना, थका हुआ सा गाँव, जहाँ सुबहें पक्षियों की चहचहाहट से नहीं, बल्कि लोगों के दुख-सुख की मिली-जुली आवाज़ों से खुलती थीं। और उसी गाँव के पूर्वी छोर पर थी सावन सिंह की बूढ़ी कच्ची कोठरी – दीवारों की मिट्टी झड़ चुकी थी, छप्पर पुआल के सहारे आखिरी साँसें ले रही थी, मगर उस घर के भीतर जो उम्मीद बची थी, उसने अभी तक हार नहीं मानी थी।

सावन सिंह रोज की तरह आज भी भोर की पहली रोशनी के साथ खाट से उठ गया। उसके शरीर की हड्डियाँ जैसे एक-दूसरे को सहारा देकर खड़ी थीं। सिरहाने रखी लकड़ी की छड़ी उठाकर वह बरामदे में आया। सामने तुलसी चौरा था, जहाँ उसकी पत्नी देवकी हर दिन दीप जलाती थी – मानो उस दीप की लौ ही उनके जीवन के अँधेरे को रोककर खड़ी हो।

देवकी पानी का लोटा भर रही थी। उसने सावन को देखा और उसकी झुकी आँखों में चिंता तैर गई। “आज फिर रात में करवटें ही बदलते रहे न?” देवकी ने धीमे स्वर में पूछा।

सावन हल्की मुस्कान के साथ बोला “नींद तो जैसे रूठ गई है, देवकी…मन कह रहा था आज कुछ होगा…कोई खबर आएगी…पता नहीं क्यों।”

देवकी उसे लंबे समय से देख रही थी। वह जानती थी कि उसके बूढ़े पति की दुनिया एक ही बात पर टिक रही है उनका बेटा सूरज। वही सूरज जो पन्द्रह साल पहले घर से निकला था नौकरी की तलाश में और फिर जैसे दुनिया में कहीं खो गया।

देवकी ने लोटा नीचे रखा और अपना आँचल ठीक करती हुई बोली “हर दिन तू यही कहता है, हर दिन उसी डाकिए की राह देखता है…पर इतनी लंबी चुप्पी…” उसकी आवाज टूट गई।

सावन ने उसे सांत्वना देते हुए कहा “बेटा है, देवकी। अपना खून है। कैसे भूल जाएगा? जरूर आएगा। बस किसी मुसीबत में फँसा होगा।”

देवकी चुप रही। उसे यह डर सालता था कि कहीं सूरज अब इस दुनिया में हो भी या नहीं, मगर वह यह दर्द सावन पर नहीं उड़ेलना चाहती थी। बूढ़े आदमी की उम्मीद ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी है – ऐसा वह मानती थी।

उस दिन भी सावन सड़क के किनारे बैठ गया – डाकिए का इंतजार करते हुए। बगल से गुजरते बच्चे हंसते हुए कहते – “देखो-देखो, बुड्ढा काका फिर चिट्ठी का इंतज़ार कर रहा है!”
“पन्द्रह साल में कोई भूल गया हो तब भी एक बार लौट आता है…”
“पक्का बेटा दूसरे घर-गाँव में बस गया है!”

सावन इन तानों को सुन भी लेता तो शायद असर ही न पड़ता। उसका दिल तो बस एक ही आवाज़ सुनता था – मेरे सूरज की चिट्ठी आएगी।
आज से पन्द्रह साल पहले की शाम के दृश्य उसे बार-बार याद आते थे। उस दिन सूरज ने नयी कमीज पहनी थी, बाल तेल से चमक रहे थे और उसकी आँखों में आत्मविश्वास था “बाबू, बड़ी कंपनी में काम मिलेगा तो आपको ले जाऊँगा शहर। मिट्टी का घर छोड़कर पक्का घर बनवाऊँगा।”

सावन ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा था – “सूरज, चाहे अमीर बन जाना… मगर चिट्ठी लिखना मत छोड़ना। तेरा आना न सही, तेरी चिट्ठी ही मेरा सहारा है।”

लेकिन जीवन ने कभी सावन को वह सहारा दिया ही नहीं। एक बार चिट्ठी आई थी – सिर्फ एक। उसमें लिखा था “अम्मा-बाबू, मैं ठीक हूँ। नौकरी मिली है। जल्दी लौटूँगा” और उसके बाद चुप्पी… गहरी चुप्पी… जिसे सावन की आशा भी काट नहीं पाई।

पहले दो साल तक बहू पूजा अपने पति के लौट आने की राह देखती रही। फिर मायके वालों के दबाव में उसकी दूसरी शादी हो गई। वह जाते वक्त देवकी से लिपटकर रोती रही “अम्मा, मेरी किस्मत ही फूटी थी…”
सावन उस दिन फूट-फूटकर रो पड़ा था। किसी बुजुर्ग आदमी का रोना दुनिया में सबसे दर्दनाक दृश्य होता है।

दिन बीतते रहे। मौसम बदलते रहे।
लेकिन इंतजार का मौसम कभी नहीं बदला।
एक दिन दोपहर को अचानक धूल उड़ाते हुए डाकिया गाँव में घुसा। उसकी गले की आवाज दूर से ही सुनाई दी – “काका! ओ काका सावन! आपके नाम चिट्ठी आई है!”

सावन के हाथ की छड़ी गिरते-गिरते बची।
देवकी दौड़ती हुई आई – “कहाँ है चिट्ठी? कहाँ?”
डाकिए ने एक पुराना, पीला पड़ा लिफाफा सावन के हाथ में देते हुए कहा – “पुरानी डाक की बाल्टियाँ साफ हो रही थीं… उसी में यह मिली। तीन साल पहले की है शायद।”

सावन के हाथ काँपते थे। देवकी को डर लगा – कहीं चिट्ठी में बुरी खबर न हो। लिफाफा खोला, अंदर वही लिखावट उनका सूरज!
“बाबू-अम्मा,
मैं ठीक हूँ। मजदूरी करता हूँ। जल्दी गाँव आऊँगा, आपका सूरज।”

देवकी के आँसू ढलक पड़े। लेकिन फिर… उसकी नजर तारीख पर गई।
तीन साल पुरानी! मतलब तीन साल पहले वह लौटने वाला था…फिर क्यों नहीं आया?
सावन ने कहा “निश्चित ही कोई मजबूरी रही होगी। मेरा सूरज जिंदा होगा, मैं जानता हूँ।”
इसी बीच किसी ने बताया कि शहर के सरकारी अस्पताल में एक घायल आदमी महीनों से भर्ती है। कुछ लोग कहते थे वह सूरज जैसा दिखता है।
सावन ने उसी समय तय कर लिया “मैं चलूँगा। अगर वह मेरा सूरज है तो उसे घर लाऊँगा।”
देवकी ने बिना विरोध किए कपड़े बाँध लिए।

शहर का अस्पताल एक गंदे और दुखों से भरे संसार जैसा था। वार्ड नंबर 6 में वह आदमी सफेद चादर में लिपटा पड़ा था। नर्स ने कहा “याददाश्त चली गई है। बोलता नहीं।”

सावन उस आदमी के चेहरे को देखते-देखते जैसे बर्फ हो गया।
चेहरा मिलता था… पर आँखों में कोई पहचान नहीं थी।
देवकी समझ गई “यह हमारा सूरज नहीं… हमारा बेटा तो आँखों से पहचान लेता।”
सावन की आँखें नम थीं “चलो देवकी। मेरा सूरज कहीं और होगा। जिंदा होगा।”
वह लौट आया, लेकिन लौटते हुए जैसे उसके कंधों पर दुनिया का बोझ लद गया।

समय आगे बढ़ता रहा। रातें लंबी, दिनों से भी लंबी होती गईं। एक दिन शाम को सावन की साँसें बहुत भारी हो गईं।
डॉक्टर ने देवकी को बाहर बुलाया
“अब ज़्यादा समय नहीं है। जो अंतिम इच्छा हो, वह पूरी कर दीजिए।”
देवकी ने कांपते हुए पूछा “क्या… क्या आख़िरी है?”
डॉक्टर ने सिर झुका लिया।
देवकी आकर सावन के पास बैठी।
उसने उसके हाथ अपने हाथ में लिए जो अब बहुत हल्के हो गए थे।
सावन ने कहा – “देवकी… अगर सूरज लौट आए… तो उसे कहना बाबू नाराज़ नहीं था। मैं बस… बस उसका इंतजार करते-करते थक गया हूँ…”
देवकी की रुलाई फूट पड़ी “तू ऐसे मत बोल सावन… मेरा मन बैठ जाता है।”

उस रात सावन चुप रहा। वह बरामदे में रखे छोटे से दीये को देखता रहा है वही दीया जिसे वह पन्द्रह वर्षों से बुझने नहीं देता था।
रात के तीसरे पहर… दीया एक बार टिमटिमाया… फिर धीरे-धीरे बुझ गया और उसी क्षण सावन की साँस ऐंठकर थम गई।

सुबह पूरा गाँव इकट्ठा हो गया। “बेचारा…बेटे के इंतजार में ही चला गया…”
चिता तैयार हुई। देवकी के भीतर जैसे हजार सुइयाँ चुभ रही थीं।
ऐसे में गाँव के छोर से एक दुबला-पतला, थका हुआ, धूल से भरा आदमी लड़खड़ाते हुए आता दिखाई दिया।
देवकी ने उसे देखा…और उसके मुँह से चीख निकली… “सूरज!!!”

वह आदमी दौड़ा – आँखों में आँसू, चेहरे पर पछतावे का बोझ।
सूरज देवकी के पैरों में गिर पड़ा “अम्मा! मुझे माफ कर दो! मैं लौटना चाहता था… पर जेल हो गई… काम में फँसा रहा… भटक गया… पर बाबू कहाँ हैं? मैं उनके चरण छूना चाहता हूँ!”

देवकी ने रोते हुए उसका चेहरा पकड़ लिया – “बेटा… तेरे बाबू… कल रात चले गए…”

सूरज के चेहरे से खून उतर गया। वह चिता की ओर भागा – “बाबू!!! बाबू!!! एक बार… एक बार बोल दो…”
लेकिन जो आवाज़ पन्द्रह साल से उसकी प्रतीक्षा में थक गई थी वह अब हमेशा के लिए शांत हो चुकी थी।
पुरोहित ने धीमे स्वर में कहा – “बेटा, आग तू ही देगा। यह तेरी जिम्मेदारी है।”
सूरज काँपते हाथों से मशाल लेकर खड़ा हुआ। लपटें उठीं और उसके साथ सूरज की सिसकियाँ आसमान में टकराती रहीं।

शाम को घर लौटने पर देवकी ने एक पुराना कागज सूरज को दिया – “तेरे बाबू ने मरने से एक रात पहले यह लिखी थी…”
सूरज पढ़ता गया – “मेरे सूरज,
अगर तू लौट आए तो जान ले कि मैंने अंतिम साँस तक तेरा इंतज़ार किया। मैं तुझसे नाराज नहीं हूँ। अगर मैं न रहूँ…तो मेरी चिता को आग तू देना। मुझे यह सुकून मिलेगा कि मेरा बेटा लौटा, तेरा बाबू”

सूरज चिट्ठी सीने से लगा कर फूट पड़ा
“बाबू… मैं लौट आया…पर देर से… बहुत देर से…” – उस दिन के बाद सूरज ने उस उजड़े हुए घर को फिर से बसाना शुरू कर दिया। वह रोज बरामदे में दीया जलाता, जो अब हमेशा शांति से जलता रहता।

गाँव के लोग कहते – “सावन सिंह का सूरज देर से लौटा, पर लौटकर उसने अपने बाबू के सपनों को फिर जगा दिया।”

कभी-कभी रात में सूरज दीये के पास बैठकर फुसफुसाता – “बाबू… मैं फिर कहीं नहीं जाऊँगा। आपके नाम की आबरू रखूँगा। आपकी आख़िरी चिट्ठी मेरे जीवन का मार्ग बन गई है।”

और हवा जैसे कहीं दूर से कहती – “बेटा… तू लौट आया… अब मेरा इंतज़ार पूरा हुआ…”

Ashok verma
अशोक वर्मा “हमदर्द”, लेखक

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