।।प्रेम का एकांत।।
अशोक वर्मा “हमदर्द”
मैंने नहीं उठाए सवाल
उस ईश्वर पर
जिसे लोग पुकारते हैं हजार नामों से।
न मैंने टटोला ग्रंथों का अंधकार
न साधा कोई मंत्र,
न थामा किसी देवालय की चौखट।
तलाशा तो बस
तुम्हारे सन्नाटे में खुद को,
तुम्हारी खामोशी में
एक अज्ञात आलोक को।
तुम्हारे प्रेम ने
छीन ली मुझसे
वो सारी व्याख्याएँ
जिन पर टिका था मेरा ज्ञान।
तुम्हारा एकांत
बिखेर देता है
उन सपनों की राख,
जिन्हें दुनिया सोने की ठानी थी।
मैं रुक जाता हूँ
उसी क्षण
जहां तुम्हारी स्मृति
पैरों को बेड़ियों में जकड़ लेती है।
आगे बढ़ने की चाह
एक भटका हुआ भ्रम लगती है।
देखता हूँ
टूटते शब्दों को
कांपते अधरों से
पढ़ता हूँ तुम्हारी आँखों की भाषा
और
अपनी सारी वाणी को
मौन होते देखता हूँ।
तुम्हारे प्रेम का एकांत
एक दर्पण है
जिसमें मैं
अपनी क्षुद्रता से
बार-बार हार जाता हूँ।

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