।।शेरनी का दूध।।
अशोक वर्मा “हमदर्द”
कभी कहा जाता था
शिक्षा शेरनी का दूध है,
जो पिएगा वही दहाड़ेगा
वही न्याय की बात करेगा
वही अन्याय से लड़ेगा
वही रोशन करेगा चिराग अपनी कुटिया का।
मगर अब…
शेरनी के दूध में भी मिलावट मिलने लगी है।
शिक्षा बोली में बिकने लगी है।
पाठशालाएं मोल-भाव के अड्डे हो गई हैं।
कक्षा के द्वार पर लिखा है!
“दहाड़ना तभी संभव है,
जब जेब भारी हो।”
अब ज्ञान नहीं तौला जाता बुद्धि की तुला पर,
बल्कि नापा जाता है फीस की रसीद से।
शेरनी का दूध अब बोतलों में बंद है,
जिस पर कीमत छपी है…
हर घूंट का मोल तय है।
कभी शिक्षा जीवन की रोशनी थी,
अब शिक्षा खुद अंधेरों से डरती है।
बस्तों का बोझ बढ़ गया है,
मन का उजाला कम हो गया है।
जो जितना लगाएगा,
वो उतना ही पाएगा,
अब यही नया मंत्र बन गया है।
शेरनी की दहाड़ अब कागजों में सिमट गई है,
और शेरनी खुद
फीस की कतार में खड़ी है
अपने दूध को बेचने के लिए।

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