।।उम्मीद और प्रेरणा।।
अनुराधा वर्मा “अनु”
बेटियाँ किसी घर में जन्म नहीं लेतीं,
वह घर को जन्म देती हैं
उसके आंगन, उसके अर्थ,
उसकी धड़कनों को आकार देती हुई।
जब वह पहली बार उंगली पकड़कर चलती है,
तब लगता है मानो समय
अपने सबसे मासूम क्षणों को
आपकी हथेली में रख गया हो।

पिता के लिए बेटी
किसी मूरत की तरह होती है
जिसे छूने से डर लगता है,
और खो देने का भय
नींद तक में पीछा करता है।
वह बड़ी होती है…
पर उसके बड़े होने की कहानी
उम्र में नहीं लिखी जाती,
लिखी जाती है त्याग में,
उसकी मुस्कान में छुपी
अनगिनत चिताओं में,
और उन सपनों में
जो वह दुनिया से पहले
अपने पिता की आंखों में पढ़ लेती है।
कभी वह पिता की पीठ थपथपाती है,
कभी पिता की झुकी हुई हिम्मत को
दोबारा सीधा खड़ा कर देती है।
और पिता यह सोचकर भर उठते हैं
“मेरी बच्ची कब इतनी मजबूत हो गई?”
उसके पांव की आहट
थके हुए दिनों में उम्मीद बन जाती है।
उसकी आवाज
हर मुश्किल का हल लगती है।
और उसका हाथ
ऐसा सहारा
जो भगवान भी
हर किसी को नहीं देते।
पर बेटियाँ सिर्फ सहारा नहीं,
एक दिशा होती हैं
जहाँ घर जाकर ठहरता है,
जहाँ जीवन जाकर अर्थ पाता है।
कभी वह खुद टूटकर रोती है,
पर हिम्मत का दामन
कभी नहीं छोड़ती।
वह अपने दर्द को
पिता की मुस्कान से छोटा समझती है,
और अपनी खुशियों को
परिवार की धड़कनों में बाँट देती है।
कितना अद्भुत है
एक नाजुक सी बच्ची,
जो अपनी छोटी-सी हथेलियों में
पूरे घर का भविष्य थाम लेती है।
बेटियाँ सिर्फ बेटी नहीं होतीं
वे उम्मीद होती हैं।
वे प्रेरणा होती हैं।
वे वह रोशनी होती हैं
जिसके कारण जीवन
अँधेरों पर भरोसा नहीं करता।
और जब एक दिन
वह विदा होती है…
तो लगता है जैसे घर से
एक चेहरा नहीं,
एक पूरा मौसम चला गया।
फिर भी उसकी हँसी,
उसकी बातें,
उसकी हर छोटी आदत
घर की दीवारों में
मंत्रों की तरह गूंजती रहती है
याद दिलाती हुई कि
बेटियाँ जाती नहीं,
बस रूप बदलकर
घर का आशीर्वाद बन जाती हैं।
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