वाराणसी। हनुमान जी और अंगद जी दोनों ही समुद्र लाँघने में सक्षम थे, फिर पहले हनुमान जी लंका क्यों गए? श्री रामचरितमानस में एक चौपाई आती है :
“अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा॥”
अर्थात, अंगद जी कहते हैं कि मैं समुद्र के पार तो जा सकता हूँ, किन्तु लौटने में मुझे संशय (संदेह) है। अंगद जी बुद्धि और बल में अपने पिता बालि के समान ही थे! सौ योजन का समुद्र लांघना उनके लिए बिल्कुल सरल था। फिर उन्हें लौटने में क्या संशय था? आइए जानते हैं इसके पीछे की एक रोचक कथा…
गुरु का वह श्राप और अंगद का संशय : कथाओं के अनुसार, बालि के पुत्र अंगद और रावण के पुत्र अक्षय कुमार दोनों एक ही गुरु के आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। अंगद बचपन में अत्यंत बलशाली और स्वभाव से थोड़े चंचल थे। वे प्रायः खेल-खेल में अक्षय कुमार को थप्पड़ मार देते थे, जिससे वह मूर्छित हो जाता था।
अक्षय कुमार के बार-बार रोने और गुरुजी से शिकायत करने पर, एक दिन गुरुजी ने क्रोधित होकर अंगद को श्राप दे दिया – “अब यदि तुमने अक्षय कुमार पर हाथ उठाया, तो तुम उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे।”
यही वह संशय था! अंगद जी को डर था कि यदि वे लंका गए और उनका सामना अक्षय कुमार से हो गया, तो इस श्राप के कारण राम-काज में विघ्न आ सकता है।
रावण की चाल और अक्षय कुमार का भेजा जाना : यह श्राप वाली बात रावण भी भली-भांति जानता था। इसलिए जब राक्षसों ने रावण को बताया कि एक विशाल वानर अशोक वाटिका को उजाड़ रहा है, तो रावण ने सबसे पहले अक्षय कुमार को ही भेजा।
रावण को लगा कि वानरों में समुद्र लांघने की क्षमता केवल बालि या अंगद में है। बालि का वध हो चुका है, तो निश्चय ही अंगद आएगा! रावण की योजना थी कि अंगद श्राप के कारण अक्षय कुमार पर वार नहीं कर पाएगा और अक्षय उसे सरलता से मार देगा।
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥
बजरंगबली का पराक्रम और मेघनाद का प्रवेश : किन्तु, लंका में तो स्वयं महाबली हनुमान जी थे! जब हनुमान जी ने अक्षय कुमार का वध कर दिया और यह सूचना रावण तक पहुँची, तो वह चौंक गया। उसने तुरंत अपने सबसे बलवान पुत्र मेघनाद को भेजा और कहा –
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥
रावण समझ गया कि यह वानर अंगद नहीं है, इसलिए उसने मेघनाद को आदेश दिया कि इस वानर को मारना नहीं, बंदी बनाकर लाना। रावण स्वयं देखना चाहता था कि बालि और अंगद के अतिरिक्त ऐसा कौन सा शक्तिशाली वानर उत्पन्न हो गया है।
निष्कर्ष : संकटमोचन की दूरदृष्टि –
हनुमान जी “ज्ञानिनामग्रगण्यम्” (ज्ञानियों में अग्रगण्य) हैं। वे भली-भांति जानते थे कि जब तक अक्षय कुमार जीवित रहेगा, अंगद जी लंका में निर्भय होकर प्रवेश नहीं कर पाएंगे।
इसीलिए, हनुमान जी ने अक्षय कुमार का वध करके अंगद जी के मार्ग का वह सबसे बड़ा कांटा हटा दिया। इसी कारण बाद में अंगद जी बिना किसी संशय के श्री राम के शांति दूत बनकर लंका जा सके और रावण की सभा में अपना पैर जमाकर उसका अभिमान तोड़ सके।
जय श्री सीताराम जी
ज्योतिर्विद रत्न वास्तु दैवज्ञ पीपी
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 99938 74848
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