बॉलीवुड डेस्क, मुंबई | 21 जुलाई 2026: हिंदी सिनेमा के गीतों की बात हो और आनंद बक्शी का नाम न आए, ऐसा शायद मुमकिन नहीं है। उनके लिखे गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं। कम ही लोग जानते हैं कि जिस गीतकार ने हजारों यादगार गाने दिए, उनकी फिल्मी शुरुआत सिर्फ 150 रुपए से हुई थी।
संघर्ष भरा सफर
आनंद बक्शी का जन्म 21 जुलाई 1930 को अविभाजित भारत के रावलपिंडी में हुआ था। बचपन में उनका नाम आनंद प्रकाश बख्शी था। विभाजन के समय उनका परिवार रावलपिंडी छोड़कर भारत आ गया। उन्होंने कम उम्र में जिंदगी की कई मुश्किलें देखीं।
उन्होंने भारतीय सेना में नौकरी की और जबलपुर के सिग्नल कोर में भी तैनात रहे। सेना में रहते हुए ही वह कविताएं लिखते थे। इसी दौरान उन्होंने कलाकार बनने का सपना देखना शुरू किया, जो उन्हें मुंबई ले आया।
पहली कोशिश में उन्हें सफलता नहीं मिली। वे संघर्ष करते रहे, कई जगह काम तलाशा, लेकिन निराशा हाथ लगी। कुछ समय बाद वे वापस सेना में लौट गए।
1956 में फिर मुंबई, फिर संघर्ष
1956 में आनंद बक्शी ने एक बार फिर मुंबई जाने का फैसला किया। इस बार उन्होंने तय कर लिया था कि वह अपनी किस्मत जरूर आजमाएंगे।
इसी संघर्ष के बीच भगवान दादा ने उन्हें अपनी फिल्म ‘भला आदमी’ में गीत लिखने का मौका दिया। आनंद बक्शी ने इस फिल्म के लिए चार गीत लिखे। इन चार गानों के लिए उन्हें 150 रुपए मेहनताना मिला।
उनका पहला रिकॉर्ड गीत ‘धरती के लाल, न कर इतना मलाल’ था। इस छोटे से मौके ने उनके लिए फिल्मी दुनिया का दरवाजा खोल दिया।
बड़ी पहचान और सफलता
‘भला आदमी’ के बाद भी उन्हें तुरंत काम नहीं मिला। उन्होंने धैर्य बनाए रखा। धीरे-धीरे उनके गीत लोगों तक पहुंचने लगे।
1965 में आई फिल्म ‘जब जब फूल खिले’ ने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई। इस फिल्म के लिए उन्होंने ‘परदेसियों से ना अंखियां मिलाना’, ‘ये समां समां है ये प्यार का’ जैसे शानदार गीत लिखे।
इसके बाद, आनंद बक्शी ने ‘आराधना’, ‘अमर प्रेम’, ‘कटी पतंग’, ‘शोले’, ‘हरे रामा हरे कृष्णा’, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘ताल’ और ‘गदर: एक प्रेम कथा’ जैसी कई फिल्मों के लिए यादगार गीत लिखे।
निष्कर्ष: आनंद बक्शी की कहानी साबित करती है कि सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत, धैर्य और सकारात्मक सोच कितनी जरूरी होती है। 150 रुपए से शुरू हुआ उनका सफर हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े गीतकारों में उन्हें शामिल कर गया।
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