तारकेश कुमार ओझा, खड़गपुर। भारतीय परंपरागत ज्ञान-विज्ञान, शिक्षा, कला, संगीत, खेल, आयुर्वेद, पर्यावरण संरक्षण, कृषि तथा सनातन जीवन मूल्यों को आधार बनाकर झाड़ग्राम जिले के नयाग्राम प्रखंड में ‘स्वदेशी आदर्श ग्राम’ विकसित करने की महत्वाकांक्षी पहल शुरू की गई है।
इस परियोजना का उद्देश्य प्राचीन भारतीय आदर्शों और आधुनिक आवश्यकताओं के समन्वय से आत्मनिर्भर एवं सतत ग्रामीण विकास का मॉडल तैयार करना है।
इस पहल की शुरुआत नयाग्राम के विधायक एवं पश्चिम बंगाल सरकार के राज्य मंत्री अमिय किस्कू ने की है। उन्होंने बताया कि नयाग्राम विधानसभा क्षेत्र के चयनित गांवों में चरणबद्ध तरीके से विभिन्न विकास एवं सेवा केंद्र स्थापित किए जाएंगे।
परियोजना का मुख्य लक्ष्य भारतीय परंपराओं पर आधारित ऐसे आत्मनिर्भर गांवों का निर्माण करना है, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन का समग्र विकास सुनिश्चित हो।
मंत्री अमिय किस्कू ने कहा कि झाड़ग्राम एक वनांचल क्षेत्र है, जहां आदिवासी समुदाय आज भी अपनी संस्कृति और परंपराओं को संजोए हुए है। हालांकि आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव से गांवों की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत में बदलाव आ रहा है।
ऐसे समय में भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को पुनर्स्थापित करने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सुवर्णरेखा नदी घाटी में विकसित प्राचीन मानव सभ्यता और मिश्रित सांस्कृतिक विरासत को आधार बनाकर सतत ग्रामीण विकास का मॉडल तैयार किया जाएगा। आने वाले समय में इस परियोजना को पूर्ण स्वरूप देने का प्रयास किया जाएगा।
‘स्वदेशी आदर्श ग्राम’ परियोजना की रूपरेखा तैयार करने और उसके क्रियान्वयन के लिए सेवा भारती महाविद्यालय के भूगोल विभाग के सहयोगी प्राध्यापक डॉ. प्रणब साहू को मुख्य सलाहकार एवं प्रधान विशेषज्ञ नियुक्त किया गया है। मंत्री के आमंत्रण पर डॉ. साहू ने नयाग्राम क्षेत्र के कई गांवों का दौरा कर परियोजना का प्रारंभिक मसौदा मंत्री को सौंपा।
डॉ. प्रणब साहू ने कहा कि वैदिक काल, सिंधु सभ्यता, मौर्य और गुप्त काल से लेकर श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीरामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद तक भारतीय संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान और जीवन दर्शन ने विश्व को दिशा दी है। लेकिन मध्यकालीन और औपनिवेशिक शासन के दौरान इस समृद्ध परंपरा को काफी नुकसान पहुंचा।
अब समय आ गया है कि भारतीय शिक्षा, कला, संगीत, आयुर्वेद, कृषि विज्ञान, पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक सोच को पुनर्जीवित करते हुए स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से स्वदेशी सोच पर आधारित सतत ग्रामीण विकास और मानव संसाधन विकास का नया मॉडल तैयार किया जाए।
उन्होंने बताया कि दो से तीन गांवों को एक इकाई मानकर लगभग 20 विभिन्न संस्थान विकसित किए जाएंगे। इनमें आर्यभट्ट आलोक केंद्र (भारतीय ज्ञान-विज्ञान केंद्र), चाणक्य प्रशिक्षण केंद्र (हस्त एवं तकनीकी शिक्षा), गोविंद मुरारी गोपालन एवं चारागाह केंद्र, पंचवटी सेवा केंद्र (आयुर्वेद चिकित्सा), ग्रामीण पुषा केंद्र (जैविक कृषि एवं खाद्य उत्पादन), नालंदा पुस्तकालय एवं संचार केंद्र,
वंदे मातरम् सांस्कृतिक केंद्र, अभिमन्यु ग्रामीण खेल मैदान, एकलव्य वन एवं पर्यावरण संरक्षण केंद्र, पांडव जन आहार केंद्र, चरखा एवं नील उत्पादन केंद्र, तपोवन औषधीय उद्यान, अबीर एवं धूपबत्ती निर्माण केंद्र तथा खाद्य प्रसंस्करण केंद्र जैसी संस्थाएं स्थापित की जाएंगी। इन सभी गतिविधियों में ग्रामीणों की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
परियोजना का उद्देश्य स्थानीय प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों का उपयोग कर भारतीय परंपरागत शिक्षा, संस्कृति, आयुर्वेद, ज्ञान-विज्ञान और स्वदेशी विचारधारा को पुनर्स्थापित करना है। साथ ही मानव संसाधन विकास, रोजगार सृजन और ग्रामीणों की आय बढ़ाकर आत्मनिर्भर गांवों का निर्माण करना भी इसका प्रमुख लक्ष्य है।
इस परियोजना के समन्वयक एवं सर्वेक्षक के रूप में नयाग्राम के खड़िका माथानी निवासी एवं समाजसेवी संजय बारिक भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
ताज़ा समाचार और रोचक जानकारियों के लिए आप हमारे कोलकाता हिन्दी न्यूज चैनल पेज को सब्स्क्राइब कर सकते हैं। एक्स (ट्विटर) पर @hindi_kolkata नाम से सर्च कर, फॉलो करें।

