निशान्त, Climate कहानी, कोलकाता: दुनिया इस समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, यानी एआई, के पीछे भाग रही है। तकनीकी कंपनियां नए डेटा सेंटर बना रही हैं। सरकारें डिजिटल अर्थव्यवस्था को भविष्य की ताकत बता रही हैं। और निवेश का पैमाना इतना बड़ा है कि आंकड़े सुनकर हैरानी होती है।
लेकिन इस तकनीकी दौड़ के बीच एक नया सवाल सामने आया है। अगर भविष्य डेटा सेंटरों में बसने वाला है, तो क्या वे खुद जलवायु परिवर्तन से सुरक्षित हैं?
जलवायु जोखिम विश्लेषण संस्था XDI की नई रिपोर्ट कहती है कि शायद नहीं।
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
रिपोर्ट में दुनिया भर में प्रस्तावित 2,595 डेटा सेंटरों का विश्लेषण किया गया। निष्कर्ष यह है कि इनमें से कई ऐसे इलाकों में बन रहे हैं जहां बढ़ती गर्मी, बाढ़, जंगल की आग और दूसरे चरम मौसम जोखिम आने वाले वर्षों में गंभीर चुनौती बन सकते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक कम रेज़िलिएंस वाले परिदृश्य में 2026 में ही लगभग 6 प्रतिशत प्रस्तावित डेटा सेंटर “उच्च जोखिम” श्रेणी में आते हैं। अगर जलवायु परिवर्तन की रफ्तार मौजूदा दिशा में बनी रही, तो यह जोखिम आगे और बढ़ सकता है।
गर्मी सबसे बड़ा उभरता खतरा
यह सिर्फ इमारतों का सवाल नहीं है। डेटा सेंटर आधुनिक अर्थव्यवस्था के इंजन बन चुके हैं। जब कोई व्यक्ति ऑनलाइन वीडियो देखता है, क्लाउड पर फाइल सेव करता है, डिजिटल भुगतान करता है या एआई चैटबॉट से सवाल पूछता है, तो उसके पीछे कहीं न कहीं एक डेटा सेंटर काम कर रहा होता है।
रिपोर्ट बताती है कि सबसे बड़ा खतरा सिर्फ बाढ़ या तूफानों से नहीं है। अत्यधिक गर्मी भी तेजी से उभरता जोखिम बन रही है। डेटा सेंटरों के भीतर हजारों सर्वर लगातार चलते रहते हैं। इन्हें ठंडा रखना जरूरी होता है। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, उन्हें चलाने की लागत और जोखिम दोनों बढ़ जाते हैं।
अप्रत्यक्ष जोखिम भी गंभीर
एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष अप्रत्यक्ष जोखिमों से जुड़ा है। कई बार डेटा सेंटर को नुकसान सीधे बाढ़ या तूफान से नहीं होता। समस्या तब पैदा होती है जब बिजली आपूर्ति बाधित हो जाए, दूरसंचार नेटवर्क प्रभावित हो जाए, पानी की उपलब्धता घट जाए या आपूर्ति श्रृंखला टूट जाए।
रिपोर्ट कहती है कि भविष्य में ऐसे अप्रत्यक्ष जोखिम कई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष भौतिक नुकसान से भी बड़े साबित हो सकते हैं।
रिपोर्ट ने अमेरिका, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और कुछ अन्य क्षेत्रों को ऐसे स्थानों के रूप में चिन्हित किया है जहां प्रस्तावित डेटा सेंटरों के लिए जलवायु जोखिम अपेक्षाकृत अधिक हैं।
भारत के लिए मायने
भारत का नाम प्रमुख जोखिम हॉटस्पॉट के रूप में रिपोर्ट में नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि चिंता की कोई वजह नहीं है। भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर बाजारों में शामिल है।
मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, पुणे और नोएडा जैसे शहरों में बड़ी संख्या में नए डेटा सेंटर बन रहे हैं। इसी दौरान देश लगातार अधिक तीव्र गर्मी की लहरों का सामना कर रहा है।
XDI के संस्थापक और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी प्रमुख Dr Karl Mallon कहते हैं कि एआई अवसंरचना बनाने की वैश्विक दौड़ अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ रही है।
उनके मुताबिक भविष्य के जलवायु जोखिम पहले से तय नहीं हैं। सही स्थान का चयन, बेहतर डिज़ाइन और मजबूत रेज़िलिएंस उपाय डेटा सेंटरों के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
निष्कर्ष: रिपोर्ट का संदेश सीधा है। एआई का भविष्य सिर्फ बेहतर सॉफ्टवेयर या तेज़ चिप्स से तय नहीं होगा। यह इस बात से भी तय होगा कि डेटा सेंटर कहां बनते हैं, वे कितनी गर्मी झेल सकते हैं, उन्हें बिजली और पानी कितनी आसानी से मिल सकता है और वे चरम मौसम की घटनाओं के बीच कितने समय तक काम करते रह सकते हैं।
अगर जलवायु जोखिमों को नजरअंदाज किया गया, तो भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ी चुनौती किसी तकनीकी प्रतिस्पर्धी से नहीं, बल्कि बदलते मौसम से मिल सकती है।
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