Ai chatbot mental health

क्या चैटबॉट्स से कम हो रहा मेंटल हेल्थ स्टिग्मा? शोध में सामने आई सच्चाई!

हेल्थ डेस्क, कोलकाता | 6 जनवरी 2026: मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में मौजूद झिझक और बदनामी का डर (मेंटल हेल्थ स्टिग्मा) आज भी करोड़ों लोगों को मदद लेने से रोकता है। ऐसे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित चैटबॉट्स, जैसे ChatGPT,

इस चुप्पी को तोड़ने में आंशिक रूप से मददगार साबित हो सकते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं का साफ कहना है कि ये टूल्स पेशेवर चिकित्सा या मनोचिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं हैं

ऑस्ट्रेलियाई शोध में क्या सामने आया?

ऑस्ट्रेलिया की एडिथ कोवन यूनिवर्सिटी (ECU) द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि एआई चैटबॉट्स मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बातचीत को आसान बना सकते हैं—खासकर उन लोगों के लिए जो आमने-सामने किसी से मदद लेने में असहज महसूस करते हैं।

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इस स्टडी के तहत 73 ऐसे लोगों का सर्वे किया गया, जिन्होंने अपनी किसी मानसिक या भावनात्मक दुविधा को लेकर ChatGPT जैसे एआई टूल्स का इस्तेमाल किया था। शोध का फोकस यह समझना था कि एआई के इस्तेमाल से स्टिग्मा (कलंक) पर क्या असर पड़ता है।

ईसीयू में मास्टर ऑफ क्लिनिकल साइकोलॉजी के छात्र स्कॉट हन्ना ने कहा,“नतीजों से पता चलता है कि यह टूल असरदार हो सकता है और बाहरी जजमेंट के डर को कम करने में अहम भूमिका निभाता है।”

स्टिग्मा क्यों बनता है बड़ी रुकावट?

मेंटल हेल्थ से जुड़ा स्टिग्मा लोगों को खुलकर बात करने और मदद मांगने से रोकता है। यह स्थिति न सिर्फ लक्षणों को गंभीर बना सकती है, बल्कि लंबे समय तक इलाज से दूरी भी पैदा करती है।

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स्टडी में तीन तरह के स्टिग्मा पर खास ध्यान दिया गया—

  • सार्वजनिक स्टिग्मा (लोग क्या सोचेंगे)
  • जजमेंट का डर (भेदभाव या नकारात्मक प्रतिक्रिया)
  • स्वयं का स्टिग्मा (खुद को कमजोर समझना)

शोध में पाया गया कि जिन लोगों को ChatGPT जैसे टूल्स उपयोगी लगे, उनमें लोगों द्वारा जज किए जाने का डर अपेक्षाकृत कम था और वे मदद लेने के प्रति ज्यादा खुले नजर आए।

गोपनीयता बनी बड़ी वजह

जैसे-जैसे एआई टूल्स आम होते जा रहे हैं, लोग अपनी मानसिक परेशानियों को साझा करने के लिए इनका सहारा ले रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है निजता और बिना जजमेंट के बातचीत का अनुभव

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स्टडी के मुख्य नतीजे

  • जिन लोगों को लगा कि चैटजीपीटी असरदार है, वे इसे दोबारा इस्तेमाल करने की ज्यादा संभावना रखते थे।
  • चैटजीपीटी के इस्तेमाल से जजमेंट का डर काफी कम हुआ, क्योंकि यह पूरी तरह गोपनीय और बिना किसी मानवीय जजमेंट के होता है।
  • निजता (प्राइवेसी) की वजह से लोग खुलकर बात कर पाते हैं—यह स्टिग्मा कम करने का सबसे बड़ा कारण है।
  • हालांकि, शोधकर्ता स्कॉट हन्ना ने चेतावनी दी: “चैटजीपीटी को इलाज के मकसदों के लिए डिजाइन नहीं किया गया था। इसके जवाब कभी-कभी गलत भी हो सकते हैं। इसलिए यूजर्स को जिम्मेदारी से प्रयोग करने की सलाह देते हैं।”
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हन्ना ने कहा, “भले ही ChatGPT को मेंटल हेल्थ के लिए डिजाइन नहीं किया गया हो, फिर भी लोग इसका इस्तेमाल तेजी से कर रहे हैं।”

लेकिन सावधानी जरूरी

शोधकर्ताओं ने इस बात को लेकर भी आगाह किया कि एआई चैटबॉट्स में नैतिक और क्लिनिकल सीमाएं होती हैं।

“ChatGPT को इलाज के मकसद से विकसित नहीं किया गया है और हालिया रिसर्च बताती है कि इसके जवाब कभी-कभी गलत या भ्रामक भी हो सकते हैं,” हन्ना ने कहा।

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इसी वजह से विशेषज्ञों की सलाह है कि एआई-बेस्ड टूल्स को सपोर्ट सिस्टम के रूप में देखा जाए, न कि उपचार के विकल्प के रूप में।

आगे क्या?

ईसीयू की रिसर्च टीम ने मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में एआई की भूमिका को लेकर और गहन अध्ययन की जरूरत पर जोर दिया है, ताकि भविष्य में सुरक्षित, जिम्मेदार और प्रभावी डिजिटल सपोर्ट सिस्टम विकसित किए जा सकें।

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