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अघोरा चतुर्दशी आज

वाराणसी। अघोरा चतुर्दशी एक विशेष धार्मिक पर्व है जिसे पितरों की पूजा एवं तंत्र कार्यों की सिद्धि के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रों के अनुसार भाद्रपद माह में आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अघोरा चतुर्दशी का उत्सव मनाया जाता है।

खासतौर से यह पर्व हिमाचल से जुड़े क्षेत्रों, उत्तराखंड, नेपाल और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार इस समय को डगयाली भी कहा जाता है और यह उत्सव दो दिनों तक चलता है। पहले दिन को छोटी डगयाली तथा दूसरे दिन इसे बड़ी डगयाली के नाम से जाना जाता है।

शास्त्रीय ग्रंथों में इस चतुर्दशी को कुशाग्रहणी अमावस्या या कुशोत्पाटिनी अमावस्या के रूप में भी वर्णित किया गया है। यह पर्व विशेष रूप से भगवान शिव के उपासकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन की गई पूजा, दान, व्रत और तर्पण कार्यों का विशेष फल प्राप्त होता है। विशेष रूप से पितरों की शांति और आत्मा की तृप्ति हेतु इस तिथि का विशेष महत्व है।

अघोरा चतुर्दशी का मुहूर्त समय : अघोरा चतुर्दशी का पर्व हिन्दू कैलेंडर के अनुसार 21 अगस्त 2025, बृहस्पतिवार के दिन मनाया जाएगा।
भाद्रपद कृष्ण पक्ष अघोरा चतुर्दशी प्रारम्भ : 12:44 पी एम अगस्त 21
भाद्रपद कृष्ण पक्ष अघोरा चतुर्दशी समाप्त : 11:55 ए एम अगस्त 22
अघोरा चतुर्दशी के दिन ही मासिक शिवरात्रि का पर्व भी मनाया जाएगा। इस दिन गुरु पुष्य योग की प्राप्ति होने से विशेष शुभ योग की प्राप्ति होगी।

अघोरा चतुर्दशी नकारात्मक शक्तियों से बचाव का समय : अघोरा चतुर्दशी के दिन भूत-प्रेत बाधाओं से मुक्ति पाने हेतु कई स्थानों पर विशेष परंपराएं निभाई जाती हैं। हिमाचल प्रदेश के सोलन, शिमला और सिरमौर जिलों में लोग अपने घरों की खिड़कियों और दरवाजों पर कांटेदार झाड़ियों को लगाते हैं ताकि नकारात्मक शक्तियां घर में प्रवेश न कर सकें।

यह परंपरा सदियों पुरानी है और इसे ग्रामीण संस्कृति में गहरे विश्वास के साथ निभाया जाता है। अघोरा चतुर्दशी पूर्वजों का स्मरण और प्रकृति से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन का स्नान, व्रत और दान हमें कर्मों की शुद्धि और मानसिक शांति की ओर अग्रसर करता है।

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अघोरा चतुर्दशी कुशा संग्रह का समय : अघोरा चतुर्दशी के दिन धार्मिक रूप से कई विशेष क्रियाएं की जाती हैं। सबसे महत्वपूर्ण कार्य है कुशा का संग्रहण। हिंदू धर्म में कुशा को एक विशेष प्रकार की पवित्र घास के रुप में जाना जाता है जिसका प्रयोग लगभग सभी धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है। इसलिए इस दिन विशेष रूप से वर्षभर के लिए शुद्ध और योग्य कुशा एकत्रित की जाती है।

इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार ऐसी कुशा उपयुक्त मानी जाती है जो हरी हो, जिसमें सात पत्तियां हों, उसका मूल तीखा हो और कोई हिस्सा कटा फटा न हो। ऐसी कुशा देवताओं के पूजन और पितृ कार्यों दोनों के लिए उचित होती है। कुशा तोड़ते समय “हूं फट्” मंत्र का उच्चारण करना अनिवार्य माना गया है, जिससे इसे धार्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।

अघोरा चतुर्दशी श्राद्ध कर्म का समय : इस दिन पितरों के लिए तर्पण एवं श्राद्ध कर्म भी किए जाते हैं। यह मान्यता है कि अघोरा चतुर्दशी के दिन शिव के गणों को स्वतंत्रता प्राप्त होती है। भूत प्रेत, पिशाच आदि मुक्त होकर इधर-उधर विचरण करते हैं। इसलिए लोग विशेष उपाय करते हैं जिससे बुरी आत्माएं घर के लोगों को हानि न पहुंचा सकें। इसी कारण कई स्थानों पर घरों की खिड़कियों और दरवाजों पर कांटेदार झाड़ियां लगाई जाती हैं।

यह नकारात्मक ऊर्जा को रोकने का प्रतीकात्मक उपाय है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर संकल्प लेते हैं, उपवास करते हैं और शिवजी की पूजा के साथ पितरों को जल अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किया गया तर्पण, पितरों तक अवश्य पहुंचता है और उन्हें शांति प्राप्त होती है।

अघोरा चतुर्दशी का ज्योतिष अनुसार महत्व : चतुर्दशी तिथि का समय ज्योतिष शास्त्र और हिंदू पंचांग में भी विशेष स्थान रखता है। यह तिथि विशेषकर कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में अधिक प्रभावी मानी जाती है। इस समय को कुछ विशेष कारणों की पूर्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। कुछ खास सिद्धियों की प्राप्ति, कुछ विशेष कार्यों की सफलता, वाद-विवाद विजय, नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति, बंधन मुक्ति इत्यादि से संबंधित माना गया है।

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कार्तिक मास की अघोरा चतुर्दशी का दिन विशेष पुण्यदायक और कल्याणकारी माना जाता है। इस दिन तीर्थ स्नान, व्रत, जप, दान और तप से प्राप्त पुण्य से व्यक्ति अपने पापों और ऋण से मुक्त हो सकता है। यह दिन संयम, साधना और स्वयं की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण समय माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि यदि अमावस्या तिथि, विशेष नक्षत्र, दुर्लभ योग और उपयुक्त करण का संयोग हो तथा वह शनिवार, सोमवार या गुरुवार जैसे शुभ वार में पड़े तो यह दिन और भी फलदायक हो जाता है।

अघोरा चतुर्दशी को विशेषकर उन लोगों के लिए उत्तम माना गया है जो जीवन में कठिनाइयों, मानसिक क्लेश और पितृदोष का अनुभव कर रहे हैं। इस दिन श्रद्धा भाव से किया गया कोई भी धार्मिक कार्य अक्षय फल देने वाला होता है। भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र जाप और ध्यान इस दिन विशेष फलदायी माने गए हैं। कुछ मान्यताओं के अनुसार यह व्रत यदि एक वर्ष तक लगातार किया जाए तो तन, मन और धन के समस्त कष्टों से मुक्ति मिलती है।

ज्योतिष अनुसार भी इस दिन को बहुत विशेष माना गया है। स्वास्थ्य ज्योतिष के अनुसार इस दिन किए गए कार्यों के प्रभाव से शरीर के रोग और बीमारी दूर होती हैं, मानसिक शांति प्राप्त होती है और घर में सुख-शांति का वास होता है। इस दिन किया गया श्राद्ध कर्म पितरों की आत्मा को तृप्त करता है, जिससे वे प्रसन्न होकर अपने वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

इसके साथ ही, यह तिथि भूत-प्रेत बाधाओं को समाप्त करने में भी अत्यंत सहायक मानी जाती है। घर की शुद्धि, वातावरण की नकारात्मकता को समाप्त करने हेतु विशेष उपाय किए जाते हैं जिससे रोग, क्लेश और संकटों से छुटकारा मिले।

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ज्योतिर्विद रत्न वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 99938 74848

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