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33 साल बाद प्रो. सिंहल के 38 वाश चित्रों की प्रदर्शनी दिल्ली में लगाई जाएगी

प्रो. सुखवीर सिंहल ऐसे पहले चित्रकार थे जिनके वाश चित्रों में नर नारियों के अलग अलग भाव भंगिमाओं के समूह प्रदर्शन देखने को मिलता है

लखनऊ। लखनऊ में कला संस्कृति साहित्य की एक पुरानी परंपरा रही है। जिसका एक बड़ा स्रोत लखनऊ के केशरबाग चौराहे से पहले अमीरुद्दौला लाइब्रेरी के बगल से एक रास्ता जिसका नाम प्रो. सुखवीर सिंहल के नाम से रखा गया है। यह रास्ता सीधा प्रो. सुखवीर सिंहल के कला वीथिका तक जाती है। प्रो. सुखवीर सिंहल भारतीय चित्रकला पद्धति को जीवित रखने और समृद्ध बनाने वाले कलाकारो में एक विशेष योगदान दिया है। सिंहल के कृतियों का विशाल संग्रह इस वीथिका में प्रदर्शित है। सिंहल जी के अमूल्य धरोहर को संरक्षित करने और उन्हें जगह जगह प्रदर्शित करने और लोगों को उनके कला पद्धति के बारे में जागरूक करने के लिए सिंहल के परिवार में उनकी पुत्री, पोती ने बीड़ा उठाया हुआ है और भली भांति कर भी रहे हैं।

इसी क्रम में लगभग 33 साल बाद नई दिल्ली में सिंहल के 38 वाश शैली में बनी कलाकृतियों की एक प्रदर्शनी सोमवार से लगाई जा रही है। यह प्रदर्शनी दिल्ली के एनेक्सी आर्ट गैलरी, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एनेक्सी, लोधी एस्टेट में 17 जून तक प्रदर्शनी शीर्षक “द साइलेंट कैनवस स्पीक अगेन” लगाई जा रही है। जिसका उद्घाटन पंकज सिंह, विधायक नोएडा और भाजपा उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष, चित्रकार पद्म भूषण जतिन दास, कला समीक्षक उमा नायर एवं कवि प्रयाग शुक्ल करेंगे। प्रदर्शनी की क्यूरेटर एवं सिंहल की पोती प्रियम चंद्रा ने बताया कि यह एक एकल पूर्वव्यापी प्रदर्शनी है जो एक भूले हुए कलागुरु की स्थायी प्रतिभा की पुष्टि करती है और यह प्रदर्शनी एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि और एक शक्तिशाली पुनरुद्धार दोनों है, जो भारतीय सौंदर्यशास्त्र, दर्शन और आध्यात्मिक जांच के लिए समर्पित जीवन भर की कलाकृतियों का खजाना पेश करती है।

कला समीक्षक भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने बताया कि प्रो. सुखवीर सिंहल अपने जीवन काल में वाश शैली को बहुत महत्व दिया। सैकड़ों की संख्या में वाश पेंटिंग बनाई है। इसके अलावा जल रंग में दृश्य चित्रण भी किया है जो कि बहुत ही सुंदर हैं और आज भी रंग ताज़े लगते हैं। उनके ब्रश स्ट्रोक जबरदस्त है। रंगो का मिश्रण भी अकल्पनीय है। उनके वाश पेंटिंग में एक, दो, तीन फिगर नहीं बल्कि ढेर सारे मानव के समूह आकृतियों को अलग अलग भाव भंगिमाओं में देखा जा सकता है मुझे लगता है सिंहल जी एक मात्र कलाकार रहे जिन्होंने एक वाश पेंटिंग में मानव के समूह आकृतियों को बनाते रहे हैं। कपड़ा, पेपर, लकड़ी के पैनल पर भी जल रंग में काम किया है, स्टाइल एक ही है।

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14 जुलाई 1914 को मुजफ्फरनगर जनपद (उ.प्र.) में जन्मे गांधीवादी, मानवतावादी प्रो. सुखवीर सिंहल यद्यपि चित्रकला और संगीत में बचपन से ही रुचि रखते थे, परन्तु कला साधना के क्षेत्र में इनका प्रवेश राष्ट्रीय आन्दोलन के माध्यम से हुआ। हुआ यह कि असहयोग आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने के कारण हुई गिरफ्तारी से बचाने के लिये घर के लोगों ने इन्हें कही दूर जाने की सलाह दी। भाग्यवश ये पहुँचे लखनऊ अपने एक मित्र के पास जिसने इन्हें पहुंचा दिया लखनऊ स्कूल ऑफ आर्ट्स में। अतः इन्होंने 1936 में पाँच वर्षीय राजकीय डिप्लोमा तो प्राप्त कर लिया। परन्तु भारतीय कला-शैली के वास्तविक ज्ञान की पिपासा अतृप्त रही। इस पिपासा की तृप्ति हेतु प्रो० सिंहल ने भारतीय चित्रकला के एक कृति आचार्य प्रो० ए०के० हाल्दर, जो इसके प्रवर्तक डॉ. ए.एन. टैगोर के प्रमुख शिष्य और लखनऊ आर्ट स्कूल के तत्कालीन प्रधानाचार्य थे, को गुरु मानकर ज्ञानार्जन किया।

लखनऊ के राजकीय कला एवं शिल्प विद्यालय से प्रशिक्षित और ए.के. हलदर और अवनिंद्रनाथ टैगोर जैसे दिग्गजों से मार्गदर्शन प्राप्त कर उन्होंने बंगाल स्कूल की परंपरा को आगे बढ़ाया और शास्त्रीय भारतीय रस सिद्धांत पर आधारित एक विशिष्ट वाश पद्धति के तकनीक का बीड़ा उठाया। इस तकनीक ने उन्हें प्रतीकात्मक रंग, सूक्ष्म बनावट और परतदार रचना के माध्यम से जटिल भावनात्मक स्थितियों और आध्यात्मिक विचारों को व्यक्त करने की अनुमति दी। प्रदर्शनी में विविध और असाधारण कृतियाँ शामिल हैं, जिनमें उत्कृष्ट वॉश पेंटिंग, लकड़ी पर लेक्सिट पेंटिंग, खादी, रेशम की कलाकृतियाँ, चित्रांकन, परिदृश्य और दुर्लभ मूर्तियाँ शामिल हैं। मुख्य आकर्षण में पुरस्कार विजेता “राम का प्रस्थान” और “विवाह जुलूस” शामिल हैं, जो कभी राष्ट्रीय प्रदर्शनियों और शाही संग्रहों में शामिल थे, साथ ही “तू धूल है, धूल में लौटता है”, जो किंग जॉर्ज पंचम द्वारा शाही संग्रह के लिए अधिग्रहित एक मार्मिक कृति थी।

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प्रो. सिंहल न केवल एक कलाकार थे, बल्कि एक दार्शनिक, शिक्षक, स्वतंत्रता सेनानी और मानवतावादी भी थे। 1938 में उन्होंने प्रयागराज में कला भारती की स्थापना की, एक ऐसी संस्था जिसने ललित कला, शास्त्रीय संगीत और नृत्य में अनगिनत छात्रों को प्रशिक्षित किया। उन्होंने इंदिरा गांधी और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे नेताओं को सलाह दी और सांस्कृतिक विरासत के मामलों में पंडित जवाहरलाल नेहरू के करीबी सलाहकार के रूप में काम किया। उनकी बौद्धिक खोज लेखन तक भी फैली हुई थी; उन्होंने भारतीय चित्रकला पद्धति (1985) लिखी और कला और कलाकार का विकास नामक एक अप्रकाशित तीन-खंड ग्रंथ छोड़ा। “द साइलेंट कैनवस स्पीक्स अगेन” केवल एक प्रदर्शनी नहीं है, यह एक घर वापसी है।

उन्होंने इंदिरा गांधी और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे नेताओं को सलाह दी और सांस्कृतिक विरासत के मामलों पर पंडित जवाहरलाल नेहरू के करीबी सलाहकार के रूप में काम किया। उनकी बौद्धिक खोज लेखन तक भी फैली हुई थी; उन्होंने भारतीय चित्रकला पद्धति (1985) लिखी और कला और कलाकार का विकास नामक एक अप्रकाशित तीन-खंड ग्रंथ छोड़ा। “द साइलेंट कैनवस स्पीक्स अगेन” केवल एक प्रदर्शनी नहीं है, यह एक घर वापसी है। यह एक ऐसे युग की आवाज़ को पुनर्जीवित करता है जो कभी समय के साथ दब गई थी, जो अब हर कैनवास के माध्यम से स्पष्ट रूप से गूंज रही है।

कला गुरुओं के आशीर्वाद में प्रो. सिंहल तेजी के साथ सफलता की मंजिलें पार करने लगे। कला मर्मज्ञों से भी इन्हें मान्यता मिलने लगी। एआईएफएसी सोसायटी नई दिल्ली, मैसूर दशहरा प्रदर्शनी, बाम्बे आर्ट सोसायटी एव अकेडेमी ऑफ फाइन आर्ट्स कलकत्ता द्वारा आयोजित मुख्य अखिल भारतीय कला प्रदर्शनियों में क्रमशः लेक्सिट एवं दो वाण-पेन्टिम्स, टेपेस्ट्रीवर्क, सिल्क-पेन्टिग पाश्चात्य शैली, पुनः लेक्सिट-पेन्टिग पर सर्वोच्च अथवा ‘आर.एन. टैगोर गोल्डमेडल’ जैसे अनेक पुरस्कार प्राप्त करते रहे। राजकीय कला महाविद्यालय लखनऊ के माध्यम से प्रोफेसर ऑफ फाइन आर्ट और बाद को प्रधानाचार्य पद से 1973 में सेवानिवृत्ति होने के बाद कैसरबाग स्थित परिसर में 1975 में भारतीय चित्रकला पद्धति के आधार पर कला प्रशिक्षण देना पुनः आरम्भ करके की। और जीवन के अंतिम दिन तक कला के प्रति समर्पित रहे। प्रो. सिंहल का निधन 29 नवम्बर 2006 को हो गया।

AIFACS, बॉम्बे आर्ट सोसाइटी और अन्य द्वारा पुरस्कृत, प्रो. सिंहल के काम को सम्राट जॉर्ज पंचम ने भी खरीदा था। उन्होंने इंदिरा गांधी की शादी का निमंत्रण कार्ड भी डिज़ाइन किया था। सेवानिवृत्ति के बाद, उन्होंने अपनी कला के साथ शास्त्रीय संगीत, प्राकृतिक चिकित्सा और योग के अपने ज्ञान को मिलाकर पढ़ाना और प्रेरित करना जारी रखा।

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