।।शाप से स्वीकृति तक।।
आदित्य त्रिपाठी
ऋषि वाल्मीकि के पृष्ठों से
एक कथा पुरानी आती है
अहिल्या और गौतम की व्यथा
जो हर युग दोहराती है ।
वह भ्रम का क्षण वह इंद्र का छल
वह पल की थी नादानी
मर्यादा टूटी सत्य छिपा
एक भूल बनी जिंदगानी।
वह जानती थीं मगर मोह में
विवेक का दीप बुझा बैठीं
एक क्षणिक आकर्षण में
स्वयं की गरिमा लुटा बैठीं।
गौतम लौटे सत्य प्रकट हुआ
क्रोध की अग्नि धधकी तब
इंद्र को मिला श्राप परंतु
कठोर दण्ड अहिल्या को मिला तब।
नहीं बनीं वो सचमुच पत्थर
पर पत्थर-सी हो गईं भीतर से
जीवित थीं पर प्राण विहीन
निर्जीव-सी इस जग के डर से।
एकांत निर्जीव बिन संवाद
यही था उनका श्राप
अपराधबोध का बोझ लिए
सहती रहीं आत्म-संताप।
वह स्थिति जो आज भी है
जब कोई ठोकर खाता है
समाज त्याग देता है उसे
और व्यक्ति मर जाता है।
अवसाद,अपराध,अकेलापन
यही शिला बन जाती है
शरीर खड़ा है पर आत्मा
भीतर-ही-भीतर जल जाती है।
सदियाँ बीतीं प्रतीक्षा गहरी
मौन ने जब आकार लिया
तभी वन में आगमन हुआ
जिसने सबको स्वीकार किया।
प्रभु राम पधारे उनके चरण
उस द्वार पर जब छू गए
न कोई प्रश्न न कोई निंदा
सारे बंधन टूट गए।
बस अतिथि सत्कार स्वीकारा
एक सरल सी स्वीकृति मिली
उस पल उस स्पर्श मात्र से
वो मृत आत्मा फिर खिल उठी।
प्राण लौटे गरिमा लौटी
जीवन का फिर अर्थ मिला
वर्षों का वह मौन टूटा
मुक्ति का अमृत कलश छला।
यह कथा सिर्फ अहिल्या की नहीं
यह हर नर और नारी की है
हर उस हृदय की दास्तान
जो गलती के भार से हारी है।
जो कहीं कोने में बैठा है
समाज से अस्वीकृत हारा हुआ
कोई पछताती नारी
कोई अपराधबोध में मारा हुआ।
आज भी हमारे चारों ओर
कई “अहिल्याएँ” मौन हैं
इंतज़ार में हैं एक ‘राम’ की
जो पूछे हे देवी तुम कौन है।
आओ हम स्वयं वह स्वीकृति बनें
वह राम का स्पर्श बन जाएँ
जो किसी के अवसाद को समझे
किसी की गरिमा लौट आए।
क्योंकि यह कथा हमें यह सिखलाती है
हर पत्थर में जीवन की संभावना जगमगाती है।
बस प्रेम और स्वीकृति की चाहत है
जो छूकर पत्थर में भी प्राण जगाती है।

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