सिक्के आज पलट कर देखे
फिर ऐसे कुछ मंजर देखे
तुमने तो जश्न-ए-आजादी
हमने चलते निश्तर देखे
कुछ ने मनसब, कुछ ने मजहब
इंसानों से ऊपर देखे
आँखों में नफरत की आतिश
और हाथों में पत्थर देखे
शहरों में घर ही पक्के हैं
रिश्ते – नाते जर्जर देखे
डीपी सिंह
(निश्तर = उस्तरा, चाकू)
(मनसब = पद, प्रतिष्ठा)
(आतिश = चिंगारी)

कवि
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