माँ के लाल सवाल पूछ रहे हैं!
डॉ. विक्रम चौरसिया
माँ ने बेटे से कहा था
बेटा, खूब पढ़ना, तू राष्ट्र की रीढ़ है।
पिता ने खेतों में पसीना बहाया,
बेटे के सपनों को अपना सपना बनाया।
कोई किसान का लाल था,
कोई मजदूर का बेटा,
कोई गाँव से आया था,
आँखों में सपनों का डेरा था।
रातें किताबों में जलती रहीं,
आँखें मंज़िल में पलती रहीं।
फिर खबर आई
परीक्षा का पर्चा लीक हो गया।
किसी के लिए खबर थी,
किसी के लिए बरसों की मेहनत का जनाजा।
युवा पूछ रहा है –
मेरी मेहनत इतनी सस्ती क्यों है?
मेरे सपनों की कीमत इतनी कम क्यों है?
किसी की भर्ती वर्षों से अटकी,
किसी की उम्र निकल गई,
किसी की आखिरी कोशिश थी,
किसी की उम्मीद बिखर गई।
दिल्ली के सत्य निकेतन में
जब इमारत भरभराकर गिरी,
माँ के लाल पढ़ने आए थे,
मलबे में उनकी साँसें थम गईं।
कभी पर्चा सपने तोड़ता है,
कभी बेरोजगारी मारती है,
कभी व्यवस्था की लापरवाही
युवा की उम्मीद हारती है।
कहते हो युवा राष्ट्र की रीढ़ है
तो उसकी रीढ़ क्यों तोड़ते हो?
किताब लेकर निकला है वह,
उसे डर और लाठी क्यों देते हो?
युवा को भाषण नहीं,
निष्पक्ष अवसर चाहिए।
मेहनत का सम्मान चाहिए,
सुरक्षित भविष्य चाहिए।
राष्ट्र मानवता सर्वोपरि,
इंसान से बड़ा कुछ नहीं।
जिस राष्ट्र का युवा सुरक्षित नहीं,
उसकी तरक्की मुकम्मल नहीं।
आज युवा चुप नहीं है,
वह सवाल लेकर खड़ा है
मेरी मेहनत का मोल कहाँ है?
मेरे सपनों का हक कहाँ है?
जब किताबों वाला युवा
सवाल लेकर सड़क पर आता है,
समझ लेना
बदलाव दस्तक दे रहा है।
जिस दिन युवा के सवाल मरेंगे,
उस दिन राष्ट्र के सपने मरेंगे।
जिस दिन युवा जाग जाएगा,
उस दिन इतिहास करवट लेगा।
स्वरचित एवं मौलिक रचना
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