पंडित जी का गरुण पुराण “धर्म टूटा या भ्रम?”
अशोक वर्मा “हमदर्द”, कोलकाता। उस दिन का दृश्य जैसे समय की दीवार पर हमेशा के लिए लिख गया था। आँगन में बिछी चटाई, सामने पिताजी की तस्वीर, और गरुड़ पुराण का गंभीर पाठ। शब्द गूंज रहे थे- पर उनके अर्थ, अशोक के दिल में चुभ रहे थे।
“शूद्र का वेद पढ़ना वर्जित है… उनके यहां ब्राह्मण का भोजन करना भी धर्म के विरुद्ध है…”
पंडित जी के ये शब्द जैसे हर उस सीख का अपमान थे, जो उसके पिताजी ने उसे दी थी।
वो उठ खड़ा हुआ था उस दिन। आवाज में आग थी, पर संस्कारों की मर्यादा भी – “पंडित जी, अगर इंसान को इंसान से अलग कर दे, तो वो धर्म नहीं… अधर्म होता है।”
उस दिन कर्मकांड अधूरा रह गया था, पर एक नया संस्कार जन्म ले चुका था।
अशोक ने पूरे गाँव के लोगों को जाति से ऊपर उठकर एक साथ बैठाकर अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए भोजन कराया था। लोगों ने उसे पागल कहा, कुछ ने विद्रोही…
पर उसके भीतर एक सुकून था – कि उसने अपने पिता को खोया नहीं, बल्कि उनके विचारों को जी लिया।
दिन बीतते गए।
गाँव अपनी पुरानी लय में लौट आया, पर उस दिन की चर्चा हर चौपाल, हर घर में होती रही।
और फिर… एक दिन अचानक खबर आई कि “पंडित जी बहुत बीमार हैं… हालत गंभीर है।”
अशोक का दिल धड़क उठा। उसने तुरंत अस्पताल का रुख किया। अस्पताल के बाहर अफरा-तफरी थी। पंडित जी के परिवार वाले परेशान थे।
“क्या हुआ?” अशोक ने पूछा।
पंडित जी के बेटे ने काँपती आवाज में कहा कि “डॉक्टर कह रहे हैं कि तुरंत खून चाहिए… पर उनका ग्रुप बहुत दुर्लभ है… कहीं मिल ही नहीं रहा…”
समय जैसे रुक गया। वो पंडित जी… जो छुआछूत की बात करते थे… आज जिंदगी और मौत के बीच खड़े थे।
घंटों बीत गए। कोई डोनर नहीं मिला। तभी अचानक अस्पताल के गेट पर हलचल हुई। दलित बस्ती का एक युवक, रवि तेजी से अंदर आया। पसीने से भीगा, साँसें तेज…
“सुना है पंडित जी को खून चाहिए… मेरा ग्रुप वही है…”
सबकी निगाहें उस पर टिक गई। पंडित जी के बेटे की आँखों में उम्मीद चमकी – “सच में…? तुम दे दोगे?”
रवि एक पल के लिए चुप रहा। फिर उसकी आवाज गूँजी – धीमी, पर भीतर तक हिला देने वाली -“दे दूँगा… क्यों नहीं दूँगा… आखिर इंसान हूँ…” फिर उसने पंडित जी की ओर देखा, जो बेहोशी की हालत में थे।
“पर एक बात पूछनी है…”
सन्नाटा छा गया।
“जिस दिन आपके घर आया था, तो बाहर बैठाकर पानी दिया गया…
कहा गया कि अंदर आ जाऊँगा तो धर्म भ्रष्ट हो जाएगा…”
उसकी आँखों में कोई गुस्सा नहीं था – बस एक टीस थी।
“आज अगर मेरा खून आपके शरीर में चला जाएगा तो… क्या आपका धर्म नहीं टूटेगा, पंडित जी?”
कमरे में खड़े हर व्यक्ति का सिर झुक गया।
अशोक की आँखें नम थीं। उसे अपने पिताजी की बातें याद आ रही थी – “बेटा, सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है…”
डॉक्टर ने जल्दी से कहा – “समय बहुत कम है, फैसला अभी करना होगा…”
पंडित जी के बेटे की आँखों से आँसू बह निकले – “भाई… हमें माफ कर दो… आज हमें सिर्फ अपने पिता की जान चाहिए… कोई धर्म-जाति नहीं…”
रवि कुछ क्षण तक उसे देखता रहा। फिर धीरे से मुस्कुराया – “इसी को तो समझाना था…” वो आगे बढ़ा – “ले चलिए डॉक्टर साहब… मेरा खून ले लीजिए…”
कुछ घंटों बाद… ऑपरेशन सफल रहा। पंडित जी की जान बच गई। जब उन्हें होश आया, तो सबसे पहले उनकी नजर रवि पर पड़ी – जो पास ही कुर्सी पर बैठा था, थोड़ा कमजोर, पर चेहरे पर संतोष।
पंडित जी की आँखों से आँसू बह निकले। काँपती आवाज़ में बोले –
“बेटा… आज तूने मुझे नया जन्म दिया है…”
रवि ने धीरे से कहा – “नहीं पंडित जी… आज आपने जन्म लिया है… इंसान बनने का…”
पंडित जी का सिर झुक गया। उन्होंने अशोक की ओर देखा – “बेटा… उस दिन तू सही था… मैं गलत था…”
उनकी आवाज टूट रही थी – “जिस धर्म को मैं बचा रहा था… वो तो मेरे अंदर ही मर चुका था… आज इसने मुझे सिखाया कि धर्म खून में नहीं, दिल में होता है…”
उस दिन के बाद गाँव बदल गया। अब कोई किसी के घर जाने से नहीं हिचकता था। एक ही चूल्हे की रोटी, एक ही पंगत में सबका भोजन और जब भी कोई पूछता – “ये बदलाव कैसे आया?”
तो लोग मुस्कुराकर कहते – “जब एक ‘अछूत’ का खून, एक ‘श्रेष्ठ’ के शरीर में दौड़ा… तब समझ आया कि खून का कोई धर्म नहीं होता…”
और कहीं दूर… अशोक के पिताजी की आत्मा सच में मुस्कुरा रही थी। क्योंकि उनका बेटा सिर्फ कर्मकांड नहीं… समाज का संस्कार बदल गया था।

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