कोलकाता। गंगा आज भी बह रही थी। उतनी ही शांत, उतनी ही गंभीर, जितनी सदियों पहले बहती थी। फर्क सिर्फ इतना था कि आज उसकी लहरों के किनारे बैठा एक आदमी भीतर से पूरी तरह सूख चुका था। सूरज ढल रहा था। आसमान पर फैली लालिमा मानो किसी ने अपने जख्मों का रंग उंडेल दिया हो। दूर मंदिर से आती घंटियों की आवाज, किनारे बैठी चिड़ियों की चहचहाहट और पानी पर तैरती छोटी-छोटी नावें… सब कुछ वैसा ही था। लेकिन आलोक के लिए अब किसी आवाज का कोई अर्थ नहीं बचा था।
उसकी निगाहें लगातार गंगा की लहरों पर थीं। जैसे वह पानी को नहीं, अपने बीते हुए वर्षों को बहते हुए देख रहा हो। उसने धीरे से बुदबुदाया- “जब एक मर्द को उसकी सहनशक्ति से ज़्यादा तकलीफ मिल जाती है न… तब उसके अंदर का हर मोह मर जाता है।”
कोई सुनने वाला नहीं था। “फिर उसे किसी के चले जाने का डर नहीं रहता… किसी रिश्ते के टूटने का दुख नहीं होता… यहाँ तक कि अपनी मौत भी उसे डराती नहीं।” उसकी आवाज में शिकायत नहीं थी। शिकायत करने वाला आदमी तो बहुत पहले मर चुका था। अब केवल उसका शरीर ज़िंदा था।
आलोक पहले ऐसा नहीं था। वह हँसता था, लोगों को हँसाता था। माँ की दवाइयों का ध्यान रखता, दोस्तों की मदद के लिए आधी रात को भी निकल पड़ता। मोहल्ले में किसी के घर शादी हो तो सबसे पहले पहुँचने वाला वही होता और फिर… एक दिन उसकी ज़िंदगी में रेहाना आई।
रेहाना… नाम सुनते ही जैसे हवा में भी खुशबू घुल जाती थी। कॉलेज की लाइब्रेरी में पहली मुलाकात हुई थी। आलोक किताब ढूँढ़ रहा था। ऊपर वाली शेल्फ से किताब निकालते समय उसका संतुलन बिगड़ा और सारी किताबें नीचे गिर पड़ीं।
“इतनी भी जल्दी क्या है?” पीछे से हँसती हुई आवाज आई।
उसने मुड़कर देखा। हल्के नीले रंग का सूट, चेहरे पर मासूम मुस्कान और आँखें… ऐसी आँखें, जिनमें इंसान अपनी पूरी उम्र भूल सकता था।
“सॉरी… मेरी वजह से शोर हो गया।”
“गलती आपकी नहीं… किताबों की है। शायद ये भी बाहर घूमना चाहती थीं।”
दोनों हँस पड़े।
उस दिन जो बातचीत शुरू हुई, वह धीरे-धीरे आदत बन गई।
कभी लाइब्रेरी, कभी कॉलेज की कैंटीन, कभी गंगा किनारे शाम की चाय…
रेहाना कहती – “अगर कभी मैं तुमसे दूर चली गई तो?”
आलोक तुरंत कहता – “गंगा उल्टी बह सकती है, लेकिन तुम मुझे छोड़कर नहीं जाओगी।”
रेहाना खिलखिलाकर हँस देती। “इतना भरोसा?”
“खुद से भी ज़्यादा।”
रेहाना उसकी आँखों में देखती और चुप हो जाती।
आलोक उस ख़ामोशी को “हाँ” समझ बैठा।
यहीं से उसकी सबसे बड़ी भूल शुरू हुई।
प्रेम में इंसान सामने वाले की ख़ामोशी को भी अपने मन का उत्तर मान लेता है। वह भूल जाता है कि हर मुस्कान प्रेम नहीं होती।
हर अपनापन साथ निभाने का वादा नहीं होता। हर “मैं हूँ न…” ज़िंदगी भर का साथ नहीं होता।
दो साल गुजर गए… दोनों ने साथ जीने के अनगिनत सपने देखे। आलोक ने नौकरी शुरू कर दी।
पहली तनख्वाह से उसने अपने लिए कुछ नहीं खरीदा। रेहाना के लिए एक छोटी-सी चाँदी की पायल खरीदी।
“सोना नहीं?” रेहाना ने पूछा।
आलोक मुस्कुराया – “सोना तो अमीर लोग देते हैं… मैं वो दूँगा जिसमें मेरी मेहनत की खुशबू हो।”
रेहाना की आँखें भर आईं। उसने पायल अपने माथे से लगाई। “इसे मैं कभी नहीं उतारूँगी।”
आलोक को लगा, जैसे उसे पूरी दुनिया मिल गई। लेकिन किस्मत अक्सर वहीं वार करती है, जहाँ इंसान सबसे ज़्यादा निश्चिंत होता है।
धीरे-धीरे रेहाना बदलने लगी। फोन कम आने लगे। मुलाकातें कम होने लगीं। बहाने बढ़ने लगे। “घर वाले देख रहे हैं…”
“आज तबीयत ठीक नहीं…”
“आज मत मिलो…”
आलोक हर बहाना सच मानता गया। प्रेम विश्वास करना सिखाता है। लेकिन अंधा विश्वास इंसान को सच देखने नहीं देता। एक शाम उसने रेहाना को शहर के सबसे बड़े होटल से निकलते देखा। उसके साथ एक महँगी कार में बैठा एक युवक था। दोनों हँस रहे थे। आलोक दूर खड़ा देखता रह गया।
उसने उसी रात रेहाना से पूछा – “वो कौन था?”
रेहाना कुछ देर चुप रही। फिर बोली – “जिससे मेरी शादी होने वाली है।”
बस… इतना ही। चार साल का प्रेम… चार शब्दों में समाप्त हो गया।
“और मैं?”
आलोक की आवाज काँप रही थी।
रेहाना ने सिर झुका लिया। “तुम अच्छे हो… लेकिन अच्छे लोग हमेशा ज़िंदगी नहीं बन पाते।”
आलोक मुस्कुरा दिया। पहली बार उसे समझ आया कि मुस्कुराहट भी रो सकती है। उसने अपनी पहली तनख्वाह की दी गई चाँदी की पायल की याद दिलाई।
“याद है? तुमने कहा था… कभी नहीं उतारोगी।”
रेहाना की आँखें भर आईं।
“मजबूरी है…”
“नहीं…” आलोक ने धीरे से कहा। “मजबूरी कभी वादे नहीं तोड़ती… इंसान तोड़ता है।”
उस दिन न उसने आँसू बहाए, न कोई हंगामा किया। वह बस चला आया। लेकिन उसी दिन उसके भीतर का आदमी मर गया। आज उसी घटना को पाँच साल हो चुके थे। लोग कहते थे – “आलोक बदल गया है।” परंतु किसी ने नहीं पूछा कि “उसे बदला किसने?” वह अब किसी से ज़्यादा बात नहीं करता था। किसी समारोह में नहीं जाता। किसी के जन्मदिन पर नहीं हँसता। किसी की मौत पर भी उसकी आँखें नहीं भीगतीं। दर्द जब सीमा पार कर जाता है, तब आँसू भी साथ छोड़ देते हैं।
गंगा की एक तेज लहर अचानक किनारे तक आई। पानी का छींटा आलोक के चेहरे पर पड़ा। वह चौंका, कुछ पल तक लहरों को देखता रहा। फिर उसकी आँखें भर आईं और उसके होंठ काँप उठे – “अब तो चैन से रहने दो, रेहाना…”
“कभी हवा के झोंकों में आकर परेशान करती हो…”
“कभी गंगा की लहर बनकर मुझे छू जाती हो…”
“जा झूठी…”
“मुझे अब पता चल गया है…”
“तू कभी मेरी थी ही नहीं…”
उसकी आवाज गंगा के शोर में खो गई।
लेकिन उसी क्षण, उसके पीछे किसी स्त्री की धीमी आवाज सुनाई दी – “अगर मैं कभी तुम्हारी थी ही नहीं…”
“…तो आज भी मेरा नाम लेकर रो क्यों रहे हो, आलोक?”
आलोक का पूरा शरीर जैसे पत्थर का हो गया। उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा… और सामने जो चेहरा खड़ा था… उसे देखकर उसकी साँसें जैसे थम गईं।
आलोक ने काँपते हुए पीछे मुड़कर देखा। कुछ क्षणों तक उसे लगा जैसे समय थम गया हो। सामने वही चेहरा… वही बड़ी-बड़ी आँखें… वही मुस्कान, जिसे उसने अपनी पूरी दुनिया समझ लिया था।
“रे… रेहाना…?” उसके होंठ काँपे। अगले ही पल हवा का तेज झोंका आया। सामने खड़ी आकृति गंगा की लहरों पर बिखरती धूप की तरह धुँधली पड़ गई। आलोक ने अपनी आँखें मल लीं। सामने कोई नहीं था। केवल गंगा बह रही थी… और हवा में एक अजीब-सी ख़ामोशी थी। वह हल्का-सा मुस्कुराया। ऐसी मुस्कान, जिसमें हँसी नहीं, हार थी।
“देखा…? “उसने खुद से कहा, “अब तो मेरी आँखें भी धोखा देने लगी हैं।” वह फिर सीढ़ियों पर बैठ गया। दोनों हथेलियाँ घुटनों पर रखीं और सिर झुका लिया। कुछ देर बाद उसके भीतर वर्षों से दबे शब्द खुद-ब-खुद बाहर आने लगे।
“जब एक मर्द को उसकी हद से ज़्यादा तकलीफ मिल जाती है न… तब उसके अंदर का हर मोह मर जाता है। पहले उसे अपने लोगों की चिंता रहती है, फिर वह उनकी आदत छोड़ देता है। पहले उसे किसी के चले जाने का डर लगता है, फिर एक दिन उसे अपने जीने और मरने में भी कोई फ़र्क नहीं लगता।”
गंगा की लहरें जैसे उसकी बात सुन रही थीं। “लोग कहते हैं मर्द रोते नहीं… सच तो यह है कि मर्द रोते-रोते एक दिन इतने थक जाते हैं कि आँसू ही उनका साथ छोड़ देते हैं। उसके बाद जो बचता है, वह इंसान नहीं… एक चलता-फिरता पत्थर होता है।”
उसने एक छोटा-सा कंकड़ उठाकर गंगा में फेंका। लहरें कुछ पल के लिए बिखरीं और फिर पहले जैसी हो गईं।
“ज़िंदगी भी ऐसी ही है… किसी के जाने से कुछ पल हलचल होती है… फिर दुनिया पहले जैसी हो जाती है। बस एक आदमी होता है जो कभी पहले जैसा नहीं हो पाता।”
उसकी आँखों के सामने एक-एक दृश्य लौटने लगा। कॉलेज का वह बरगद… बारिश में भीगती रेहाना… उसका कहना – “अगर कभी मैं खो गई तो ढूँढ़ लोगे?”
और उसका जवाब “पूरी दुनिया छान मारूँगा।”
आज उसे अपनी ही बात पर हँसी आ रही थी। “जिसे कभी पाया ही नहीं… उसे ढूँढ़ता भी कैसे?”
उसने जेब से पुराना चमड़े का बटुआ निकाला। उसमें आज भी एक सूखा हुआ गुलाब रखा था। बारह साल पुराने गुलाब की पंखुड़ियाँ अब भूरी हो चुकी थीं। लोग पैसे सँभालते हैं… कुछ लोग तस्वीरें… और कुछ अभागे लोग यादें सँभालते हैं।
आलोक तीसरी किस्म का आदमी था। वह गुलाब को देर तक देखता रहा। फिर बोला – “जानती हो, रेहाना… लोग कहते हैं वक्त हर ज़ख्म भर देता है। झूठ कहते हैं। वक्त सिर्फ़ दर्द सहने की आदत डाल देता है। घाव वहीं रहता है… बस हम मुस्कुराना सीख जाते हैं।”
अचानक उसकी नजर गंगा की लहरों पर पड़ी। उसे लगा जैसे लहरों के बीच कोई सफ़ेद दुपट्टा तैर रहा हो। वह घबराकर खड़ा हो गया।
“रेहाना…!” लेकिन अगले ही क्षण समझ गया… वह तो सिर्फ़ झाग था। वह फिर बैठ गया। अब उसकी आवाज भर्रा चुकी थी। “अब तो चैन से रहने दो, रेहाना…”
“कभी हवा के झोंकों में आ जाती हो…”
“कभी किसी गीत के बोल बनकर…”
“कभी इस गंगा की लहर बनकर मेरे पैरों को छू जाती हो…”
“जा झूठी…”
“मुझे अब समझ आ गया है…”
“तू कभी मेरी थी ही नहीं…”
“अगर मेरी होती… तो मेरे हिस्से में यह सन्नाटा क्यों आता?”
उसने सिर आसमान की ओर उठाया।
सूरज पूरी तरह डूब चुका था। अँधेरा धीरे-धीरे गंगा पर उतर रहा था। उसी समय पीछे से एक बूढ़े नाविक की आवाज आई – “बाबू… रोज आते हो। किसका इंतजार करते हो?”
आलोक मुस्कुराया। – “जिसे आना नहीं है।”
नाविक उसके पास बैठ गया। “मरे हुए लोग लौटकर नहीं आते बाबू…”
आलोक चौंका। “आपको कैसे पता…?”
बूढ़े ने गहरी साँस ली – “जिस दिन उसकी जनाजे वाली नाव इसी घाट से गुजरी थी… उस दिन भी तुम यहीं बैठे थे।”
आलोक की साँसें थम गईं। उसने वर्षों से उस दिन को अपने भीतर बंद कर रखा था। रेहाना की शादी नहीं हुई थी… शादी से तीन दिन पहले, अपने बीमार पिता को बचाने के लिए अस्पताल जाते समय जिस कार में वह थी, उसका भीषण दुर्घटना हो गया था। वह बच नहीं सकी।
यह खबर सुनकर आलोक भी मर जाना चाहता था। लेकिन मौत ने उसे भी स्वीकार नहीं किया। उस दिन से वह जी नहीं रहा था… सिर्फ़ साँस ले रहा था।
उसने कभी किसी से नहीं कहा कि उसे रेहाना से शिकायत उसके मर जाने की नहीं थी… शिकायत इस बात की थी कि वह बिना बताए चली गई। बिना आख़िरी बार उसका हाथ थामे। बिना यह कहे कि जो कुछ हुआ, वह उसकी बेवफ़ाई नहीं… किस्मत की बेरहमी थी।
गंगा की लहरें अब पहले से तेज थीं। आलोक ने धीरे से अपनी मुट्ठी खोली। उसमें वही चाँदी की पायल थी… जिसे उसने बरसों पहले रेहाना को दी थी। दुर्घटना के बाद अस्पताल से उसका सामान लौटा था। उसी सामान में यह पायल भी थी। उसने उसे आज तक किसी को नहीं दिखाया। उसने पायल को अपने माथे से लगाया और फूट पड़ा। बरसों से रोने की इजाजत न देने वाली आँखें आज हार गई थीं।
उसकी सिसकियाँ गंगा के शोर में घुल गईं।
और दूर कहीं हवा में जैसे कोई धीमी आवाज तैर गई
“आलोक… मोह छोड़ दो… प्रेम कभी नहीं मरता… केवल शरीर बिछड़ते हैं।”
आलोक ने आँखें बंद कर लीं।
पहली बार उसे लगा कि शायद गंगा केवल पानी नहीं बहाती…
वह इंसानों के अधूरे प्रेम भी अपने साथ बहाकर समुद्र तक ले जाती है।
उस रात गंगा के किनारे केवल एक आदमी नहीं रोया था… उस रात एक अधूरी प्रेम-कथा भी अपने सबसे दर्दनाक अध्याय में प्रवेश कर चुकी थी। उस रात गंगा किनारे से लौटते समय आलोक के कदम पहले से भी अधिक भारी थे। ऐसा लग रहा था मानो हर कदम के साथ वह अपने जीवन का एक और वर्ष पीछे छोड़ता जा रहा हो।
घर पहुँचकर उसने बरामदे की पुरानी कुर्सी पर बैठते ही जेब से वह चाँदी की पायल निकाली। वर्षों से वह उसके पास थी। उसने कभी उसे बेचा नहीं, किसी को दिखाया नहीं, यहाँ तक कि उसे छुआ भी कम ही था। वह पायल अब एक आभूषण नहीं थी, बल्कि उसकी अधूरी ज़िंदगी की आख़िरी निशानी थी।
तभी अलमारी साफ करते समय एक पुरानी डायरी नीचे गिर पड़ी। डायरी के भीतर एक पीला पड़ चुका लिफाफा दबा था। उस पर लिखा था – “आलोक के लिए… यदि कभी मिल सके।”
आलोक के हाथ काँपने लगे। यह रेहाना की लिखावट थी। वह कुर्सी पर बैठ गया। उसकी धड़कनें इतनी तेज थीं कि मानो सीने से बाहर निकल आएँगी। उसने काँपते हाथों से लिफाफा खोला। पत्र में लिखा था – “आलोक, अगर यह पत्र तुम्हारे हाथों तक पहुँचे, तो समझना कि मैं तुम्हारे सामने नहीं हूँ। शायद किस्मत ने हमें एक होने के लिए बनाया ही नहीं था।
तुम्हें लगता होगा कि मैंने तुम्हें धोखा दिया। लेकिन सच यह है कि मैंने तुम्हें कभी छोड़ा ही नहीं। मैंने केवल तुम्हें अपनी मजबूरियों से बचाना चाहा। मेरे अब्बू की बीमारी, घर की हालत और समाज की दीवारें मेरे प्रेम से बड़ी साबित हो गईं। मैं लड़ सकती थी, लेकिन तुम्हारी ज़िंदगी बर्बाद करके नहीं।
तुमसे एक ही शिकायत है अगर कभी मैं तुम्हें गलत समझने पर मजबूर कर दूँ, तब भी मुझसे नफरत मत करना। क्योंकि नफरत प्रेम का अंत नहीं, प्रेम की सबसे बड़ी हार होती है। अगर अगले जन्म जैसी कोई चीज होती है, तो मैं बिना किसी मजहब, बिना किसी दीवार और बिना किसी मजबूरी के सिर्फ़ तुम्हारी रेहाना बनकर आना चाहूँगी।
तुम्हारी… सिर्फ तुम्हारी,
रेहाना।”
पत्र पढ़ते-पढ़ते आलोक की आँखों से आँसू कागज पर गिरने लगे। वर्षों से जो आदमी रो नहीं पाया था, आज वह बच्चे की तरह फूट-फूटकर रो रहा था। उसने आसमान की ओर देखा और पहली बार शिकायत नहीं की। सिर्फ इतना कहा – “तू बेवफा नहीं थी, रेहाना… बदकिस्मत थी… और शायद मैं भी।”
उस रात उसे नींद नहीं आई। सुबह होने से पहले वह फिर उसी घाट पर पहुँच गया। गंगा आज भी वैसे ही बह रही थी। लहरें आज भी किनारे से टकरा रही थीं। लेकिन आज आलोक के भीतर कुछ बदल चुका था। उसने जेब से वह पायल निकाली। दोनों हथेलियों में रखकर देर तक देखता रहा। फिर मुस्कुराया – “मैंने तुम्हें वर्षों तक अपने दुख का कारण समझा। आज पता चला कि तुम तो मेरी सबसे सच्ची दुआ थीं।”
उसने धीरे से पायल को गंगा की लहरों में छोड़ दिया। पायल क्षण भर पानी की सतह पर चमकती रही। फिर गहराई में समा गई।
आलोक ने हाथ जोड़ लिए – “जा रेहाना…”
“आज सचमुच आजाद करता हूँ तुम्हें…”
“अब हवा बनकर मत आना…”
“लहर बनकर मत आना…”
“मेरे सपनों में भी मत आना…”
“क्योंकि अब मैं तुम्हें भूलना नहीं चाहता…”
“अब मैं तुम्हें याद करके रोना भी नहीं चाहता…”
“अब मैं तुम्हें अपने भीतर जीना चाहता हूँ।”
उसी क्षण एक ठंडी हवा का झोंका आया। घाट के पास लगे पीपल के पेड़ से एक सूखा पत्ता टूटकर उसकी हथेली पर आ गिरा। आलोक मुस्कुरा दिया। “समझ गया…”
“यह तुम्हारा आख़िरी सलाम है।”
वह मुड़ा और धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। पीछे मुड़कर उसने गंगा को आख़िरी बार देखा।
उसे लगा, जैसे लहरों के बीच सफेद दुपट्टा हवा में लहरा रहा हो। इस बार उसने आवाज नहीं दी। क्योंकि अब वह जान चुका था कि कुछ प्रेम मिलकर पूरे नहीं होते, बिछड़कर अमर हो जाते हैं। लोग कहते हैं, समय सब कुछ बदल देता है, यह आधा सच है। समय इंसान को बदल देता है, लेकिन सच्चा प्रेम नहीं बदलता।
टूटा हुआ पुरुष हमेशा गुस्सैल नहीं होता; कई बार वह इतना शांत हो जाता है कि उसकी खामोशी ही उसका सबसे बड़ा शोर बन जाती है। वह मुस्कुराता है, लोगों से मिलता है, अपना हर फर्ज निभाता है, लेकिन उसके भीतर एक कमरा हमेशा बंद रहता है, जहाँ कोई नहीं पहुँच सकता।
उस कमरे में कभी किसी रेहाना की हँसी गूँजती है, कभी किसी अधूरे वादे की आवाज, कभी गंगा की लहरें, और कभी हवा का कोई झोंका।
शायद इसलिए गंगा सदियों से बह रही है। वह केवल पाप नहीं धोती, वह उन प्रेम कहानियों को भी अपने साथ बहा ले जाती है, जिन्हें समाज, मजहब, मजबूरियाँ या किस्मत पूरा नहीं होने देतीं।
और तब किसी शांत संध्या में, गंगा के किसी सुनसान घाट पर, कोई आलोक फिर बैठा दिखाई देता है… लहरों को निहारता हुआ… और उसके होंठों पर बस एक ही वाक्य होता है – “अब तो चैन से रहने दो, रेहाना…”
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