IMG 20260915

यूपीआई (मोबाइल से भुगतान) पर फ़ीस का फूटा बम? -भुगतान व निपटान प्रणाली अधिनियम 2007 की धारा 10ए में संशोधन से यूपीआई का नया अध्याय

2,000 तक जीरो चार्ज, ऊपर के मर्चेंट भुगतान पर एमडीआर का रास्ता क्यों खुला? – समग्र व्यापक विश्लेषण
यूपीआई पर 2,000 रूपए की सीमा के बाद क्यों मचा राजनीतिक घमासान? – सरकार का तर्क, विपक्ष का आरोप और आम जनता की जेब पर संभावित असर?
मोबाइल से भुगतान करने वालों के लिए बड़ा सवाल- 2,000 तक यूपीआई फ्री रखने के बाद ऊपर के मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर एमडीआर क्यों? दुकानदार पर लगने वाली फीस आखिर आएगी कहां से? – कीमतों में जुड़कर ग्राहक की जेब से? – एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

गोंदिया, महाराष्ट्र। वैश्विक स्तर पर आज भारत में यूपीआई (मोबाइल से भुगतान) केवल भुगतान का माध्यम नहीं, बल्कि आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।चाय की दुकान से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक, सब्जी वाले से लेकर ऑनलाइन खरीदारी तक मोबाइल से कुछ सेकंड में भुगतान करना सामान्य बात हो गई है। ऐसे समय में केंद्र सरकार की 14 सितंबर 2026 की केंद्रीय वित्त मंत्रालय की नई अधिसूचना ने यूपीआई के भविष्य को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि 2,000 रूपए तक के यूपीआई भुगतान और रूपे डेबिट कार्ड भुगतान पर बैंक या पेमेंट सिस्टम प्रदाता सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कोई शुल्क नहीं लगा सकते। लेकिन 2,000 रूपए से अधिक के कुछ व्यापारी भुगतान के लिए भविष्य में मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लगाए जाने की कानूनी संभावना अब खुल गई है।

मैं बताना चाहूंगा कि पहले समझिए, असल में सरकार ने किया क्या है? इसे बहुत आसान उदाहरण से समझिए। मान लीजिए आपने किसी दुकानदार को 2000 रूपए यूपीआई से दिए। इस पर अभी कोई शुल्क नहीं लगाया जा सकता। लेकिन यदि आपने किसी व्यापारी को 5,000 रूपए का भुगतान किया तो नई अधिसूचना यह नहीं कहती कि आज से आपसे 25 रूपए शुल्क लिया जाएगा। ऐसा कोई 0.5 प्रतिशत शुल्क अभी तय नहीं किया गया है। असल बदलाव यह है कि पहले यूपीआई पर शुल्क लगाने की मनाही का दायरा व्यापक था, जबकि नई व्यवस्था में 2,000 रूपए तक के भुगतान को स्पष्ट रूप से शुल्क-मुक्त सुरक्षा दी गई है। इससे 2,000 से ऊपर के मर्चेंट ट्रांजक्शन पर भविष्य में एमडीआर निर्धारित करने का रास्ता खुला है। अभी दर क्या होगी, कब से होगी और किन कारोबारों पर होगी, यह अलग प्रक्रिया में सटीकता से तय होना है।

साथियों बात अगर हम एमडीआर आखिर होता क्या है? इसको समझने की करें तो मर्चेंट डिस्काउंट रेट को आसान भाषा में दुकानदार से लिया जाने वाला डिजिटल भुगतान का सेवा-शुल्क समझिए। उदाहरण के लिए, मान लीजिए किसी भविष्य की व्यवस्था में किसी व्यापारी के 10,000 रूपए के डिजिटल भुगतान पर 0.5 प्रतिशत एमडीआर तय होता है। तब शुल्क 50 रूपए होगा। इसका मतलब यह नहीं कि ग्राहक के यूपीआई ऐप से सरकार सीधे 50 रूपए काट लेगी। शुल्क भुगतान व्यवस्था में शामिल संबंधित पक्षों के बीच लागू होगा। यहीं से विवाद पैदा होता है।

सरकार कहती है कि ग्राहक से सीधे कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा, लेकिन विपक्ष का सवाल है कि यदि दुकानदार को डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के लिए खर्च करना पड़ेगा तो वह खर्च अंततः कैसे निकलेगा? दुकानदार चाहे तो अपने कारोबार की लागत में इसे शामिल कर सकता है और वस्तु या सेवा की कीमत बढ़ा सकता है। अर्थात ग्राहक को अलग से यूपीआई शुल्क दिखाई न दे, लेकिन यदि व्यापारी ने लागत कीमत में जोड़ दी तो अप्रत्यक्ष रूप से उसका बोझ ग्राहक तक पहुंच सकता है। यह विपक्ष की मुख्य चिंता है, हालांकि यह अभी संभावित प्रभाव है, कोई सटीकता से लागू उपभोक्ता शुल्क नहीं।

यह भी पढ़ें:  बाजार की समय सारिणी में बदलाव जरूरी 

साथियों बात अगर हम फिर राजनीतिक घमासान क्यों शुरू हुआ? इसको समझने की करें तो, यही सबसे बड़ा सवाल है? मुख्य विपक्षी पार्टी के युवा नेता ने आरोप लगाया है कि सरकार ने चुपचाप यूपीआई पर शुल्क लगाने का रास्ता खोल दिया है। उनका तर्क है कि 2,000 से अधिक के व्यापारी यूपीआई भुगतान संख्या में कम हो सकते हैं, लेकिन कुल लेन-देन मूल्य में उनका हिस्सा बहुत बड़ा है। इसलिए यदि भविष्य में इन पर एमडीआर लगाया गया तो उसका आर्थिक प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि दुकानदार पर लगने वाला खर्च आखिरकार ग्राहक तक पहुंच सकता है।

उन्होंने इससे आगे बढ़कर अमेरिकी भुगतान कंपनियों के दबाव का आरोप भी लगाया है। उनका दावा है कि अमेरिका की कुछ भुगतान कंपनियां भारत की ज़ीरो – एमडीआर व्यवस्था का लंबे समय से विरोध करती रही हैं और सरकार अब उसी दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने इसे अमेरिकी दबाव के सामने सरकार के झुकने से जोड़कर राजनीतिक हमला किया है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है, अमेरिकी दबाव वाला आरोप विपक्ष का राजनीतिक आरोप है; इसे सरकार द्वारा स्वीकार किया गया तथ्य नहीं माना जा सकता।

साथियों बात अगर हम सरकार का जवाब क्या है? इसको समझने की करें तो सरकार और सत्ताधारी पार्टी की ओर से कहा गया है कि मुख्य विपक्षी पार्टी ने इस मुद्दे को गलत तरीके से पेश किया है। सत्ताधारी पार्टी मीडिया प्रभारी ने विशेष रूप से उस दावे को खारिज किया है कि 2,000 से ऊपर के यूपीआई भुगतान पर तत्काल 0.5 प्रतिशत टैक्स या शुल्क लगा दिया गया है। उनके अनुसार, 5,000 पर 25 और 10,000 पर 50 वसूलने की गणना किसी सरकारी शुल्क-सूची से नहीं, बल्कि काल्पनिक 0.5 प्रतिशत दर मानकर की गई है। अभी ऐसी दर अधिसूचित नहीं हुई है। इसके अलावा पर्सन-टू -पर्सन यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को यूपीआई भुगतान को व्यापारी भुगतान से अलग समझना होगा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, नया बदलाव मुख्यतः मर्चेंट ट्रांजैक्शन के संभावित एमडीआर ढांचे से जुड़ा है।

कानून में बदलाव को भी सरल भाषा में समझिए इस पूरे मामले की जड़ पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टमस एक्ट, 2007 में है। सरल भाषा में कहें तो यह वह कानून है जो देश की भुगतान प्रणालियों को कानूनी और नियामकीय ढांचा देता है। हाल में इसमें बदलाव किया गया ताकि सरकार को यह स्पष्ट करने का अधिकार मिल सके कि किन इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों पर शुल्क नहीं लगाया जा सकता और किन परिस्थितियों में शुल्क व्यवस्था बनाई जा सकती है। इसके बाद 14 सितंबर की अधिसूचना में 2,000 तक के यूपीआई और रूपए डेबिट कार्ड भुगतान को स्पष्ट रूप से शुल्क-मुक्त श्रेणी में रखा गया।अर्थात इसे ऐसे समझिए,कानून ने दर तय नहीं की है, बल्कि शुल्क व्यवस्था के लिए कानूनी दरवाजा खोला है; वास्तविक एमडीआर लागू करने के लिए आगे अलग निर्णय और नियम जरूरी होंगे।

यह भी पढ़ें:  आप महान से महानतम बन जाएंगे : डॉ. विक्रम चौरसिया

साथियों बात अगर हम सरकार ऐसा रास्ता क्यों चाहती है? इसको समझने की करें तो सरकार का सबसे बड़ा तर्क है कि यूपीआई अब बहुत विशाल व्यवस्था बन चुका है। इसकी सुरक्षा, सर्वर, तकनीकी क्षमता, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने की व्यवस्था और लगातार तकनीकी अपग्रेड पर भारी खर्च होता है। यूपीआई की वृद्धि वास्तव में अभूतपूर्व रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार एफवाय 2016-17 में यूपीआई का वार्षिक लेन-देन मूल्य केवल ₹0.07 लाख करोड़ था, जो एफ़वाय 2025-26 में बढ़कर लगभग 314 लाख करोड़ रूपए हो गया। इसी अवधि में वार्षिक लेन-देन संख्या 1.78 करोड़ से बढ़कर 24,162 करोड़ से अधिक हो गई। यूपीआई अब 11 देशों में भी परिचालन/स्वीकृति के स्तर तक पहुंच चुका है।

इसलिए सरकार का तर्क है कि इतनी विशाल डिजिटल भुगतान व्यवस्था को हमेशा सरकारी प्रोत्साहन के सहारे चलाना लंबे समय में उचित नहीं होगा। एक ऐसा राजस्व मॉडल चाहिए जिससे भुगतान का पूरा इकोसिस्टम अधिक टिकाऊ और आत्मनिर्भर बन सके। लेकिन विपक्ष की चिंता को भी सटीकता से समझना जरूरी है, विपक्ष का सवाल सिर्फ शुल्क की राशि को लेकर नहीं है। असली चिंता यह है कि क्या आज व्यापारी पर लगने वाला खर्च कल वस्तुओं की कीमतों में दिखाई देगा?

मान लीजिए किसी व्यापारी को डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर अतिरिक्त लागत आती है। उसके सामने तीन रास्ते हो सकते हैं, वह खुद लागत उठाए, ग्राहक से अलग शुल्क मांगे या अपनी वस्तु/ सेवा की कीमत में लागत जोड़ दे। सरकार यदि ग्राहक से सीधे शुल्क लेने की अनुमति नहीं देती, तब भी तीसरा रास्ता आर्थिक रूप से संभव है। यही कारण है कि विपक्ष कह रहा है कि ग्राहक से शुल्क नहीं लिया जाएगा और ग्राहक पर कोई आर्थिक प्रभाव नहीं पड़ेगा; इन दोनों बातों को सटीकता से एक जैसा नहीं माना जाना चाहिए।

साथियों बात अगर हम असली तस्वीर क्या है? इसको समझने की करें तो, इस पूरे विवाद को तीन वाक्यों में समझा जा सकता है। पहला, 2,000 तक का यूपीआई भुगतान अभी स्पष्ट रूप से शुल्क-मुक्त है। दूसरा 2,000 से ऊपर के मर्चेंट यूपीआई ट्रांसक्शयंस पर अभी कोई निश्चित 0.5 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं हुआ है, लेकिन भविष्य में एमडीआर लगाने का कानूनी रास्ता खुला है। तीसरा राजनीतिक विवाद इस संभावित एमडीआर के आर्थिक बोझ को लेकर है कि उसका भार वास्तव में व्यापारी उठाएगा या किसी रूप में अंततः ग्राहक तक पहुंचेगा।

यही इस पूरे मामले का केंद्रीय प्रश्न है। सरकार के सामने चुनौती है कि यूपीआई को दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे लोकप्रिय रियल – टाइम भुगतान प्रणालियों में से एक बनाए रखते हुए उसका आर्थिक मॉडल भी टिकाऊ बनाया जाए। दूसरी ओर विपक्ष की चिंता है कि कहीं ग्राहक से शुल्क नहीं कहकर अप्रत्यक्ष रूप से महंगाई या वस्तुओं की कीमतों के माध्यम से उसका बोझ जनता तक न पहुंच जाए।

यह भी पढ़ें:  अहंकार ने बीजेपी 241 सीटों पर रोक दिया : RSS नेता

अतः अगर हम उपयोग पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि फिलहाल इसे यूपीआई पर शुल्क लग गया कहना जल्दबाजी होगी। अधिक सटीक बात यह है कि सरकार ने 2,000 तक के भुगतान को स्पष्ट रूप से शुल्क – मुक्त रखते हुए 2,000 से ऊपर के व्यापारी भुगतान पर भविष्य में एमडीआर लागू करने की कानूनी संभावना का रास्ता खोला है। अब असली परीक्षा आगे होने वाले निर्णयों की होगी, एमडीआर की दर कितनी तय होती है, किन व्यापारियों पर लागू होती है और सबसे महत्वपूर्ण, उसका अंतिम आर्थिक बोझ कौन उठाता है।

इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण फर्क यही है कि एमडीआर लगाने का रास्ता खुलना और एमडीआर लग जाना दो अलग बातें हैं। अभी 2,000 से ऊपर के यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर कोई 0.5 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं हुआ है। आगे की नीति ही तय करेगी कि इसका वास्तविक प्रभाव व्यापारी, भुगतान कंपनियों और अंततः उपभोक्ता पर कितना पड़ता है।

(स्पष्टीकरण : उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। यह जरूरी नहीं है कि कोलकाता हिंदी न्यूज डॉट कॉम इससे सहमत हो। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है।)

ताज़ा समाचार और रोचक जानकारियों के लिए आप हमारे कोलकाता हिन्दी न्यूज चैनल पेज को सब्स्क्राइब कर सकते हैं। एक्स (ट्विटर) पर @hindi_kolkata नाम से सर्च कर, फॉलो करें।

किशन सनमुखदास भावनानी Avatar
Fact Checked & Editorial Guidelines

Our Fact Checking Process

We prioritize accuracy and integrity in our content. Here's how we maintain high standards:

  1. Expert Review: All articles are reviewed by subject matter experts.
  2. Source Validation: Information is backed by credible, up-to-date sources.
  3. Transparency: We clearly cite references and disclose potential conflicts.
Reviewed by: Subject Matter Experts

Our Review Board

Our content is carefully reviewed by experienced professionals to ensure accuracy and relevance.

  • Qualified Experts: Each article is assessed by specialists with field-specific knowledge.
  • Up-to-date Insights: We incorporate the latest research, trends, and standards.
  • Commitment to Quality: Reviewers ensure clarity, correctness, and completeness.

Look for the expert-reviewed label to read content you can trust.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

2 × two =