श्रीराम पुकार शर्मा, हावड़ा। “जयतु संस्कृतम्, जयतु भारतम्” अर्थात ‘संस्कृत की जय हो, भारत की जय हो’। यह सनातनी भारतवासियों का देश-प्रेम और संस्कृति-प्रेम से लबालब कंठों से उत्पन्न एक विराट उद्घोष है, जो देश के साथ ही इसकी प्राचीन संस्कृत भाषा और अपनी देव-निर्मित संस्कृति के प्रति सम्मान और गौरव को अभिव्यक्त करता है। यह उद्घोष सनातन भारतीयों के अंतः से लेकर वाह्य अनुभूतियों को भी गर्व से परिपूर्ण कर देता है। हमारे देश भारत में प्रतिवर्ष ‘श्रावणी पूर्णिमा’, अर्थात ‘रक्षा बंधन’ के पावन अवसर पर बहनें, अपने भाइयों की कलाइयों पर रक्षा-सूत्र बाँध कर उसके स्वास्थ्य और मंगलमय जीवन की कामना करती है।
इसके साथ ही ‘श्रावणी पूर्णिमा’ के दिन को हमारी अति प्राचीन भाषा के रूप में देव-भाषा संस्कृत के सम्मान में ‘संस्कृत दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। श्रावण पूर्णिमा के दिन ही भारत के महान संस्कृत विद्वान और व्याकरणविद पाणिनि की जयंती भी मनाई जाती है। इसी दिन गुरुकुलों में वेदों के अध्ययन से पूर्व यज्ञोपवीत पवित्र धागा धारण किया जाता था। इस संस्कार को ‘उपनयन’ या ‘उपाकर्म संस्कार’ कहा जाता है। तत्पश्चात इसी दिन से गुरुकुलों में विद्यार्थियों को वेदों का अध्ययन प्रारंभ कराया जाता था।
आधुनिक वैदिक विद्यालयों में यह परंपरा आज भी अक्षुण्ण बनी हुई है। हमारे दिग्दर्शक महाऋषिगण ही अति प्राचीन देव-वाणी संबंधित संस्कृत साहित्य के आदि स्रोत रहे हैं। इसलिए श्रावणी पूर्णिमा को ‘ऋषि पूर्णिमा पर्व’ और ‘संस्कृत दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। संस्कृत को ‘देवनागरी’ या ‘देवताओं की भाषा’ माना जाता है और यह हमारी भारतीय संस्कृति और सभी भारतीय साहित्यों का मूल आधार भी है। संस्कृत भाषा में प्राचीन वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत जैसे कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे गए हैं, जो भारतीयता के सम्मान को बढ़ाते हैं।

प्राचीन काल में समग्र भारत में पवित्र ‘श्रावणी पूर्णिमा’ के दिन से ही शिक्षण-सत्र शुरू होता था। इसी दिन वेद-पाठ का आरंभ होता था तथा इसी दिन छात्र पवित्र शास्त्रों के अध्ययन-कार्य को प्रारंभ किया करते थे। प्राचीन भारत में पौष माह की पूर्णिमा से श्रावण माह की पूर्णिमा के एक दिन पूर्व तक विभिन्न भौगोलिक और सामाजिक कारणों को केंद्र कर, शास्त्रों का अध्ययन लगभग स्थगित ही हो जाया करता था, जो फिर से श्रावण पूर्णिमा से ही प्रारंभ होता था और वह फिर पौष पूर्णिमा तक निर्बाध चलते रहता था। इसीलिए श्रावणी पूर्णिमा के दिन को ‘संस्कृत दिवस’ के रूप से मनाया जाता है।
भारतीय सनातनी परंपरा के अनुसार संस्कृत भाषा का, न तो कोई आरंभ माना गया है और न ही इसका कोई अंत ही माना जा सकता है। आध्यात्म शास्त्रों के अनुसार संस्कृत देवों की भाषा रही है। अतः यह अपने आप में पूर्ण शाश्वत और पूर्ण दिव्य स्वरूप में है। ‘संस्कृत’ का अर्थ ही होता है “संस्कार की गयी”। अर्थात यह देवों की भाषा का ही बदला हुआ रूप है। इसकी लिपि ‘देवनागरी’ है।
इसका प्रयोग सर्वप्रथम वेदों में हुआ है। उसके बाद यह अन्य क्षेत्रों में अभिव्यक्ति की माध्यम-भाषा रहा है। यह भारत की एक प्राचीन और शास्त्रीय भाषा है, जिसमें दुनिया की पहली पुस्तक ‘ऋग्वेद’, जो देव-तुल्य महान और दिग्दर्शक ऋषियों द्वारा रचित है। हलाकी विभिन्न विद्वानों द्वारा वेदों का काल 6500 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व तक माना गया है। लेकिन संस्कृत भाषा अपनी विशिष्ठ अभिव्यंजना क्षमता में उससे भी पहले से विकसित हो चुकी है।
संस्कृत भाषा और संस्कृत साहित्य अत्यंत ही व्यापक और विशाल है । मानव जीवन के चार जो ‘पुरुषार्थ’ माने गए हैं, यथा – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं। संस्कृत साहित्य सबसे पहले हमारे वेदों को प्रस्तुत किया है, जो धर्म का आधार हैं। वेद, ही धर्म का मूल हैं। महर्षि वाल्मीकि सांसारिक काव्य और लोक-काव्य लिखने वाले प्रथम महामानव माने गए हैं।
उन्होंने देव-भाषा संस्कृत में ‘रामायण’ नामक महाकाव्य की रचना की। रामायण का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव, परवर्तित सभी भाषाओं के साहित्यों पर पड़ा है। आज भी लगभग सभी नवीनतम काव्य ‘रामायण’ की तर्ज और आधार पर लिखा जा रहा है। संस्कृत भाषा की श्रेष्ठता के अनुकूल ही भारत की प्राचीनतम आर्यभाषा का भी नाम ‘संस्कृत’ ही पड़ा है।
संस्कृत भाषा के मुख्यतः दो रूप माने गए हैं, यथा- वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत। वैदिक संस्कृत, जो वेदों की भाषा है, जिसमें ऋक्संहिता कालीन ‘ब्राह्मण’, ‘आरण्यक’ और ‘दशोपनिषद्’ नामक ग्रंथों हुई थी। ‘ऋग्वेद’ की वैदिक संस्कृत को ‘ऋग्वैदिक संस्कृत’ भी कहा जाता है, जो सबसे प्राचीन भाषा है। इसी भाषा को ‘संस्कृत’ या ‘संस्कृत भाषा’ या ‘साहित्यिक संस्कृत’ के विविध नामों से जाना जाता है।
इसका व्याकरण बहुत ही व्यवस्थित और वैज्ञानिक है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं, बल्कि महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योगशास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। इन तीनों महामहर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। इसी वैदिक संस्कृत का परावर्तित विकसित स्वरूप ही ‘लौकिक संस्कृत’ या ‘पाणिनीय संस्कृत’ है, जिसमें पर्वर्तित ग्रंथों की रचना हुई है, जैसे रामायण और महाभारत आदि।
पाणिनि ने ही नियमित व्याकरण के द्वारा संस्कृत भाषा को एक परिष्कृत एवं सर्व प्रयोग में आने योग्य रूप प्रदान् किया है। माना जाता है कि ‘पतंजलि’ के समय तक आर्यावर्त (आर्य-निवास) के शिष्ट जनों में संस्कृत प्राय: बोलचाल की भाषा बन गई थी। बाद में चलकर वह पठित समाज की साहित्यिक और सांस्कृतिक की भाषा बन गई। तदनंतर में यह संस्कृत समस्त भारत में सभी पुरोहितों की, चाहे वे आर्य रहें हों या आर्येतर जाति के हों, सभी की, सर्वमान्य सांस्कृतिक भाषा हो गई।
फिर तो आसेतु हिमाचल के व्यापक क्षेत्र में संस्कृत भाषा का प्रसार-प्रचार होता रहा। बाद में लगभग सत्रहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध से यूरोप और पश्चिमी देशों के मिशनरी एवं अन्य विद्या-प्रेमियों को संस्कृत भाषा से परिचय प्राप्त हुआ। फिर तो धीरे-धीरे पश्चिम में ही नहीं, बल्कि समस्त विश्व में संस्कृत भाषा का प्रचार हुआ। जर्मन, अंग्रेज, फ्रांसीसी, अमरीकी तथा यूरोप के अनेक छोटे-बड़े देशों के विद्वानों ने संस्कृत के अध्ययन को आधुनिक ज्ञान का आधार बनाया। आधुनिक विद्वानों के अनुसार विश्व की पुरानी भाषाओं में संस्कृत ही सर्वाधिक व्यवस्थित, वैज्ञानिक और संपन्न भाषा है।
इसी तरह से भू-मंडल के विविध भाषा-साहित्यों में कदाचित् संस्कृत का क्षेत्र सर्वाधिक विशाल, व्यापक, चतुर्मुखी और संपन्न है । इस प्रकार संस्कृत, आज केवल भारतीय एक भाषा ही नहीं है, बल्कि एक रूप से यह विश्व की उन्नत भाषा है। संसार के प्राय: सभी विकसित देशों में संस्कृत भाषा और संस्कृत साहित्य का आज व्यापक रूप में अध्ययन-अध्यापन हो रहा है।
संस्कृत भाषा भारत में बाद की भाषाओं और साहित्यों का प्रमुख और आदि स्रोत रही है। उत्तरी भारत में प्रयुक्त सभी आधुनिक भारतीय भाषाएँ किसी न किसी रूप में संस्कृत से विकसित हुई हैं और दक्षिण भारत की भाषाएँ भी संस्कृत भाषा से सम्बद्ध और पोषित रही हैं।
प्रख्यात संस्कृत लेखकों में आदिकवि महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वेदव्यास, कालिदास, भास, हर्षवर्द्धन, पाणिनी, पतंजलि, शंकराचार्य, कल्हन, जयदेव आदि नाम विशेष उल्लेखनीय है। संस्कृत भाषा में प्राचीन ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और चिकित्सा संबंधित अनगिनत महत्वपूर्ण साहित्य उपलब्ध हैं। फलतः भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में संस्कृत को विशिष्ठ स्थान प्राप्त है।
संस्कृत भाषा में साहित्य की रचना कम से कम छह हजार वर्षों पूर्व से निरन्तर होती आ रही है। इसके कई लाख ग्रन्थों के पठन-पाठन और चिन्तन में भारतवर्ष के हजारों पुश्त तक के करोड़ों सर्वोत्तम मस्तिष्क दिन-रात लगे रहे हैं और आज भी लगे हुए हैं। दीर्घ कालखण्ड के बाद भी असंख्य प्राकृतिक तथा मानवीय आपदाओं (विदेशी आक्रमणों) को झेलते हुए आज भी 3 करोड़ से अधिक संस्कृत की पांडुलिपियाँ विद्यमान हैं।
यह संख्या ग्रीक और लैटिन की पाण्डुलिपियों की सम्मिलित संख्या से 100 गुना से भी अधिक है। यह साहित्यगत संपदा, मुद्रण के आविष्कार के पहले से ही हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक विरासत रही है। हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली संस्कृत से निर्मित है। यह उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश की आधिकारिक और प्रशासनिक राजभाषा है।
आकाशवाणी और दूरदर्शन से संस्कृत में समाचार प्रसारित किए जाते हैं। यहाँ तक कि संस्कृत भाषा वर्तमान सभ्यता और संस्कृति के विकास में सहायक कम्प्यूटर और डिजिटल बुद्धि के लिए भी सबसे उपयुक्त भाषा माना गया है। त्रिभाषा सूत्र के अन्तर्गत संस्कृत भी आती है।
संस्कृत भाषा के अध्ययन-अध्यापन तथा प्रसार कार्य हेतु देशभर में कई संस्कृत विश्वविद्यालय स्थापित हुए हैं, जिनके अंतर्गत सैकड़ों संस्कृत महाविद्यालय सम्बद्ध हैं । जिनमें सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, (वाराणसी, उत्तर प्रदेश), सदविद्या पाठशाला, (मैसूर, कर्नाटक), कामेश्वर सिंह दरभंगा विश्वविद्यालय, (दरभंगा, बिहार), राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ (तिरुपति, आंध्र प्रदेश), श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, (नई दिल्ली), राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, (नई दिल्ली)
श्री जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, (पूरी, उड़ीसा), श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय, (काल्डी, केरल), कविगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय, (रामटेक, महाराष्ट्र), जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, (जयपुर, राजस्थान), श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, (वेरावल, गुजरात), महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, (उज्जैन, मध्य प्रदेश), कर्नाटक संस्कृत विश्वविद्यालय, (बैंगलुरु, कर्नाटक) आदि का नाम विशेष उल्लेखनीय है।
पहली बार देश भर में सन् 1969 में ‘संस्कृत दिवस’ मनाया गया था। इस वर्ष भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों और केंद्रीय संस्थानों को इस दिन को संस्कृत दिवस के रूप में मनाने के निर्देश दिए गए थे। ‘संस्कृत दिवस’ मनाने का उद्देश्य संस्कृत भाषा के महत्व, उसके गौरवशाली इतिहास और भविष्य के बारे में लोगों में जागरूकता फैलाना और उसे बनाए रखना तथा उसका प्रसार करना है।
इस दिन का उद्देश्य संस्कृत के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के साथ-साथ शिक्षकों, छात्रों और आम जनता के बीच इस भाषा को बढ़ावा देना है, ताकि भारत के युवाओं के बीच इस महान भाषा को लोकप्रिय बनाया जा सके। हमें गर्व है कि हम संस्कृत-भाषा और संस्कृत-सांस्कृतिक विरासत की संतान है। ऐसे में संस्कृत भाषा सहित सनातनी संस्कृति की रक्षा संबंधित विशेष कार्य भी हमारे ही कंधों पर आश्रित है।
“जयतु संस्कृतम्, जयतु भारतम् !”
श्रीराम पुकार शर्मा
अध्यापक व लेखक,
ई-मेल सम्पर्क – rampukar17@gmail.com

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